“क्या?”

क्या “घूसखोर पंडत” जैसे शीर्षक वाली फिल्म को केवल फ्रिक्शन ड्रामा कहकर उसकी सामाजिक ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना उचित है?
क्या किसी शब्द, किसी पहचान, किसी उपनाम का समाज में पहले से मौजूद अर्थ पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
क्या यह सच नहीं है कि “पंडत” शब्द सुनते ही आम दर्शक के मन में स्वतः ही “पंडित” और उससे जुड़ी एक विशेष जाति की छवि उभरती है?
क्या फिल्म निर्माता यह दावा कर सकते हैं कि वे इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव से अनजान थे?
क्या रचनात्मक स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि समाज में मौजूद संवेदनशीलताओं को जानबूझकर ठेस पहुँचाई जाए?

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क्या ब्लैक एंड वाइट सिनेमा के दौर से लेकर आज तक बार-बार पंडित, मौलवी, साधु या धर्म से जुड़े चरित्रों को नकारात्मक रूप में दिखाना एक संयोग मात्र है?
क्या यह पैटर्न यह संकेत नहीं देता कि कुछ विशेष पहचानें ही बार-बार निशाने पर ली जाती रही हैं?
क्या कभी आपने मुख्यधारा की फिल्मों में किसी और धर्म या समुदाय के व्यक्ति को उसी तीव्रता और निरंतरता से घूसखोर, बलात्कारी या धोखेबाज़ के रूप में देखा है?
क्या बाकी सभी समुदाय वास्तव में दूध के धुले हुए हैं या चयनात्मक साहस ही समस्या की जड़ है?

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क्या आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता कहने वाले यह भी स्वीकार करेंगे कि आतंक की वैचारिक घोषणाएँ अक्सर धार्मिक स्थलों से होती रही हैं?
क्या लाउडस्पीकर से दिए गए उकसावे, धमकियाँ और विभाजनकारी नारे कभी समाज का सच नहीं रहे हैं?
क्या यह सवाल उठाना ग़लत है कि उन घटनाओं पर फिल्में क्यों नहीं बनतीं?
क्या किसी खास विषय पर फिल्म बनाने से पहले निर्माता यह नहीं तौलते कि किस पर फिल्म बनाना सुरक्षित है और किस पर जोखिम भरा?
क्या यही कारण नहीं है कि कुछ सच्चाइयों पर चुप्पी और कुछ कल्पनाओं पर शोर दिखाई देता है?

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क्या जब “कश्मीर फाइल्स” जैसी फिल्म बनती है और पीड़ितों की कहानी सामने आती है तो अचानक अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस क्यों शुरू हो जाती है?
क्या पीड़ा दिखाना भी अपराध बन गया है?
क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है कि काल्पनिक कहानी के नाम पर किसी समुदाय को बदनाम किया जाए तो वह कला कहलाए और वास्तविक पीड़ा को दिखाया जाए तो वह प्रोपेगेंडा कहलाए?
क्या आज का बॉलीवुड सच में ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ा है या केवल सोशल मीडिया पर वायरल होने लायक कंटेंट की तलाश में है?

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क्या “सड़क-छाप” सोच और “एलीट” सिनेमा के बीच की रेखा धुंधली नहीं होती जा रही है?
क्या मनोज बाजपेयी जैसे गंभीर और संवेदनशील कलाकार से यह सवाल पूछना जायज़ नहीं है कि उन्होंने ऐसी फिल्म का हिस्सा क्यों बनना स्वीकार किया?
क्या एक कलाकार की ज़िम्मेदारी केवल अभिनय तक सीमित होती है या सामाजिक प्रभाव का विचार भी उसमें शामिल है?
क्या पैसों और प्रोजेक्ट्स की दौड़ में नैतिकता पीछे छूटती जा रही है?

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क्या सिर्फ यह कह देने से कि “पंडत” को “पंडित” न समझें, समाज की सामूहिक स्मृति और धारणाएँ बदल जाएँगी?
क्या निर्माता सच में मानते हैं कि दर्शक इतने भोले हैं?
क्या फिल्म को वायरल करने के लिए जानबूझकर विवाद खड़ा करना एक नई मार्केटिंग रणनीति बन चुकी है?
क्या यह रणनीति समाज को और ज़्यादा विभाजित नहीं करती?
क्या “पद्मावत” के मामले में भी यही नहीं हुआ था कि पहले नाम “पद्मावती” रखा गया और विरोध के बाद बदला गया?
क्या नाम बदलने से कहानी, संदर्भ और भावनाएँ बदल जाती हैं?
क्या यह बदलाव केवल दबाव कम करने की एक चाल नहीं थी?

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क्या सेंसर बोर्ड की भूमिका केवल तकनीकी प्रमाणपत्र देने तक सीमित रह गई है?
क्या सेंसर बोर्ड को यह नहीं देखना चाहिए कि फिल्म समाज में किस तरह का संदेश दे रही है?
क्या प्रमाणपत्र देना सामाजिक स्वीकृति की मुहर जैसा नहीं होता?
क्या ऐसी फिल्मों को हरी झंडी देना स्वयं संस्थागत संवेदनहीनता को नहीं दर्शाता?

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क्या बार-बार एक ही बहुसंख्यक धर्म-समाज को व्यथित करने वाली कहानियाँ सामने आना महज़ संयोग है?
क्या यह एक सोची-समझी प्रवृत्ति नहीं लगती?
क्या यह कहा जाना ग़लत होगा कि कुछ निर्माता बहुसंख्यक समाज को “सॉफ्ट टारगेट” मानते हैं?
क्या अल्पसंख्यक भावनाओं के नाम पर बहुसंख्यक भावनाओं की अनदेखी न्यायसंगत है?
क्या यही संतुलन की कमी समाज में आक्रोश को जन्म नहीं देती?
क्या रचनात्मकता का अर्थ जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना है?
क्या कला और अभिव्यक्ति को समाज से पूरी तरह काटकर देखा जा सकता है?

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क्या समाज को प्रभावित करने वाली कला पर सवाल उठाना असहिष्णुता कहलाएगा?
क्या विरोध दर्ज कराना लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है?
क्या ऐसे कंटेंट पर आपत्ति जताना ग़लत है जो किसी पहचान को बार-बार नकारात्मक रूप में गढ़ता है?
क्या ऐसे प्रयासों पर रोक लगनी चाहिए या कम से कम कड़े मानदंड तय नहीं होने चाहिए?
क्या समाज को ज़हर परोसने के नाम पर “क्रिएटिविटी” शब्द का दुरुपयोग नहीं हो रहा है?

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क्या यह समय नहीं आ गया है कि फिल्म निर्माता आत्ममंथन करें?
क्या दर्शकों को भी यह तय नहीं करना चाहिए कि वे किस तरह की फिल्मों को समर्थन देंगे?
क्या अंततः यह सवाल सबसे बड़ा नहीं है कि हम किस तरह का समाज बनते देखना चाहते हैं?

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Disclaimer:

यह लेख पूर्णतः वैचारिक, विश्लेषणात्मक और प्रश्नात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है।

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Video Link: https://youtu.be/FC7tEzNrAus