डॉ. गौतम पाण्डेय का विश्लेषण
भारत की लोकतांत्रिक संरचना विश्व में सबसे व्यापक और बहुस्तरीय मानी जाती है। इसी लोकतंत्र का सर्वोच्च संवैधानिक मंच- संसद, विशेषकर राज्यसभा, न केवल कानून बनाने का कार्य करती है बल्कि राष्ट्रीय मूल्यों, परम्पराओं और जनता की आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करती है। ऐसे में 24 नवंबर 2025 को राज्यसभा सचिवालय द्वारा जारी एक बुलेटिन ने न केवल संसद के भीतर हलचल पैदा की, बल्कि संसद के बाहर भी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों के बीच बहस को जन्म दिया।
सचिवालय ने अपने निर्देश में कहा कि राज्यसभा के सदस्य सदन में अपने भाषण के दौरान या बाद में “वंदे मातरम्”, “जय हिंद” जैसे राष्ट्रीय नारों का उच्चारण न करें। आश्चर्य की बात यह रही कि इसके साथ ही “थैंक यू / Thanks” जैसे
सामान्य धन्यवाद-सहित शब्दों को भी असंसदीय व्यवहार घोषित किया गया। यह आदेश विशिष्ट इसलिए भी बना क्योंकि इससे पहले कभी भी राज्यसभा जैसे उच्च सदन में “वंदे मातरम्” या “जय हिंद” को प्रतिबंधित शब्दों की श्रेणी में नहीं रखा गया था।
सचिवालय ने अपने निर्णय के पीछे तर्क दिया कि ऐसा कदम सदन की गरिमा, शांति और गंभीरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। उनका कहना था कि हाल के वर्षों में सदन में नारेबाज़ी, ताली-ठोको संस्कृति और जयकारों के कारण कार्यवाही बाधित होती रही है। इसीलिए ऐसी आवाज़ों को सीमित करके “शांतिपूर्ण व सारगर्भित बहस” सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है।
विवाद क्यों बढ़ा?
विवाद की जड़ वही है जिस पर राजनीतिक असहमति अक्सर जन्म लेती है-चयनात्मक पाबंदी। अगर सचिवालय सभी तरह की नारेबाज़ी पर व्यापक प्रतिबंध लगाता, तो शायद इस निर्णय को उतना विरोध न मिलता। पर यहाँ खास तौर पर “वंदे मातरम्” और “जय हिंद” जैसे राष्ट्रीय भावना से जुड़े नारों पर रोक लगाई गई, जिस पर विपक्ष सहित कई नागरिकों को आपत्ति हुई।
बहुतों का सवाल था-अगर उद्देश्य गरिमा और अनुशासन है, तो फिर सिर्फ राष्ट्रीय नारे ही क्यों? केवल इन नारों को निशाने पर लेना ऐसा संकेत देता है कि मानो ये नारे संसद के लिए “गैर-जरूरी” या “व्यवधानकारी” हैं, जबकि देश के स्वतंत्रता संग्राम में इनका स्थान अत्यंत ऊँचा रहा है।
विरोध के स्वर और आरोप
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस फैसले को सीधे-सीधे “राष्ट्रीय पहचान पर प्रहार” बताया। उनका कहना था कि “वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रीय गीत है, स्वतंत्रता आंदोलन का उद्बोधन है, फिर इसे कैसे असंसदीय या प्रतिबंधित माना जा सकता है?”
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह निर्णय जनता में देशभक्ति की भावना को हतोत्साहित करने वाला है। उनके अनुसार ब्रिटिश राज भी ‘वंदे मातरम्’ और ‘जय हिंद’ जैसे नारों से डरते थे, और आज़ादी के इतने साल बाद भी यदि संसद ही उन्हें रोकने लगे तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
कुछ सांसदों ने इसे अनुच्छेद-19 अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। उनका तर्क है कि संसद में बोलते समय नारे या उद्घोष लगाने की आज़ादी सांसदों की कार्रवाई का हिस्सा होती है।
पाबंदी के पीछे के सम्भावित उद्देश्य
हालाँकि सरकार या सचिवालय ने राजनीतिक उद्देश्य से इंकार किया है, पर विश्लेषकों ने कई संभावित कारक गिनाए हैं:
सदन की गरिमा और कार्यवाही को सुव्यवस्थित रखना
यह तर्क सबसे स्पष्ट है। पिछले वर्षों में हंगामे, नारे, विरोध और शोर से सदन में कामकाज अक्सर बाधित रहा है। सचिवालय चाहता था कि ऐसी गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण हो।
सत्ता और विपक्ष—दोनों की नारेबाज़ी पर रोक
कई बार राष्ट्रीय नारे भी राजनीतिक अर्थ लेने लगते हैं। संसद में इनका बढ़ता प्रयोग सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए अवसर बन गया था। इसीलिए सचिवालय शायद ऐसे नारों को भी नियंत्रित करना चाहता था जो राजनीतिक या भावनात्मक लाभ के लिए इस्तेमाल हों।
धार्मिक या राजनीतिक नारे शामिल करने से बचना
यदि सचिवालय सीधे सांप्रदायिक, धार्मिक या तीखे राजनीतिक नारों पर रोक लगाता, तो विवाद और बढ़ सकता था। शायद इस संवेदनशीलता के कारण उन्होंने राष्ट्रीय नारों को चुनकर पाबंदी लगाई—पर यही निर्णय उल्टा भारी पड़ गया।
प्रशासनिक निर्णय का राजनीतिक असर
भले ही यह निर्णय “प्रशासनिक” बताया गया हो, पर इसका सामाजिक व राजनीतिक असर बहुत व्यापक रहा। राष्ट्रीय गीत और नारों पर प्रतिबंध लगाना ऐसी संवेदनात्मक जगह पर चोट करता है जहाँ राजनीति अपने आप जन्म लेती है।
लोकतंत्र में विश्वास का प्रश्न
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण आयाम है- लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा। संसद केवल एक प्रक्रिया-नियंत्रित संस्था नहीं है; वह जनता की भावनाओं और ऐतिहासिक संघर्षों की वाहक भी है।
जब संसद की कार्यवाही में ऐसे शब्द या नारे, जिन्हें लाखों नागरिक गर्व और सम्मान से बोलते हैं, प्रतिबंधित हो जाते हैं, तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है- “क्या संसद हमारी आवाज़ का सम्मान करती है?”
भारत की स्वतंत्रता, इतिहास और देशभक्ति की भावना केवल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं हैं बल्कि ये हमारे सामूहिक व्यक्तित्व का आधार हैं। ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ सिर्फ एक गीत नहीं; वह स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना, संघर्ष और बलिदान की विरासत है।
ऐसे में जब इन प्रतीकों को “अनुचित” या “असंसदीय” घोषित किया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होता- यह लोकतांत्रिक भावना के लिए एक चेतावनी की तरह महसूस होता है।
नारा बनाम व्यवहार- विवाद की वास्तविक जटिलता
मूल समस्या यह नहीं है कि संसद में अनुशासन क्यों चाहिए। अनुशासन आवश्यक है। लेकिन अनुशासन लागू करने का तरीका और उसका प्रयोग किन शब्दों पर होता है, यह अधिक महत्वपूर्ण है।
यदि सभी प्रकार के नारे-धार्मिक, राजनीतिक, क्षेत्रीय, जातिगत, राष्ट्रीय-समान रूप से प्रतिबंधित किए जाते, तो यह निर्णय संतुलित दिखता। लेकिन जिस तरह कुछ चुने हुए राष्ट्रीय नारों पर ही विशेष रूप से ध्यान दिया गया, उससे यह कदम पक्षपातपूर्ण और संवेदनाहीन प्रतीत हुआ।
व्यापक निहितार्थ
यह पाबंदी केवल तात्कालिक व्यवस्था सुधार का उपाय नहीं है; इसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं।
- यह लोकतंत्र की अबोल भावना, यानी जनता की आवाज़ और उसकी भावनात्मक अभिव्यक्ति, को
सीमित करता है।
- यह राष्ट्रीय प्रतीकों के राजनीतिक उपयोग और सरकारी नियंत्रण पर नए प्रश्न उठाता है।
- यह नागरिकों के मन में यह शंका पैदा करता है कि क्या संसद जनता की भावनाओं को समझने या स्वीकार करने को तैयार है।
विश्लेषण: लोकतंत्र के लिए आवश्यक संवेदनशीलता
लोकतंत्र केवल नियमों, प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं का ढाँचा नहीं है। यह भावनाओं, इतिहास, संघर्षों और जनता के सम्मान पर आधारित है। संसद का उद्देश्य केवल व्यवस्थित बहस करवाना नहीं होना चाहिए; उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वह जनता की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भावनाओं का सम्मान करे।
राज्यसभा का यह निर्णय चाहे प्रशासनिक मंशा से लिया गया हो, पर इसका प्रभाव गहरा और बहुआयामी है। राष्ट्रीय नारों पर प्रतिबंध लगाकर संसद ने अनजाने में एक ऐसा संदेश दिया है जो लोकतंत्र के लिए अनुकूल नहीं है। यदि भविष्य में कोई सुधार किया जाए, तो वह सभी नारों पर समान रूप से लागू होना चाहिए ताकि न तो भावनाएँ आहत हों और न लोकतांत्रिक आदर्शों पर आंच आए।
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