पूर्णिया: कल्पना कीजिए, आप किसी प्रतिष्ठित
कॉलेज में पढ़ रहे हैं। क्लासरूम में नोट्स बनाना, दोस्तों के साथ चर्चा करना—सब कुछ
सामान्य चल रहा है। अचानक एक नोटिस आता है: "आप पर भेदभाव का आरोप लगा है।"
आप हैरान हैं, कहते हैं—मैंने तो कुछ किया ही नहीं! लेकिन जवाब मिलता है: 15 दिनों
में जांच रिपोर्ट बनेगी, और तब तक आपका करियर दांव पर लटक गया। यह कोई काल्पनिक कहानी
नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नवीनतम 'उच्च शिक्षा संस्थान समता
संवर्द्धन विनियम-2026' की कठोर सच्चाई है। जनवरी 2026 में अधिसूचित यह नियम उच्च शिक्षा
जगत में भूचाल ला चुका है। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर हो चुकी है,
सोशल मीडिया पर #UGCRollback ट्रेंड कर रहा है, और राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ी हुई
है। क्या यह वास्तव में समानता का नया दौर लाएगा, या सामान्य वर्ग के छात्रों-शिक्षकों
के लिए 'SC/ST एक्ट 2.0' साबित होगा? आइए, इसकी गहराई से पड़ताल करें।
विनियम की मूल संरचना: क्या बदला,
क्या नया जोड़ा गया?
UGC ने 2012 के पुराने नियमों
को अपडेट करते हुए यह नया विनियम जारी किया है। मुख्य बदलाव यह है कि पहले नियम केवल
अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) तक सीमित थे, लेकिन अब अन्य पिछड़ा वर्ग
(OBC) और दिव्यांग छात्रों को भी शामिल कर लिया गया है। हर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय
में दो अनिवार्य संस्थाएं बनानी होंगी: इक्विटी एंड ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC)
और समता समिति।
समिति की संरचना विवादास्पद है।
इसमें प्राचार्य या निदेशक को चेयरमैन बनाया जाएगा, लेकिन सदस्यों में आरक्षित वर्गों
(SC/ST/OBC/दिव्यांग) का भारी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। EOC को 24x7 हेल्पलाइन
चलानी होगी, साल में कम से कम दो बैठकें करनी होंगी, और किसी भी भेदभाव की शिकायत पर
अधिकतम 15 दिनों में जांच पूरी कर फैसला सुनाना होगा। यदि संस्थान ऐसा करने
में विफल रहता है या 'सही कार्रवाई' नहीं करता, तो सजा कठोर है—UGC फंडिंग रोकी जा
सकती है, कोर्स बंद हो सकते हैं, यहां तक कि संस्थान की मान्यता तक रद्द हो सकती है।
नतीजा? हजारों छात्रों का भविष्य अधर में लटक जाएगा।
यह प्रावधान सरकारी दफ्तरों या
अदालतों से भी तेज है, जहां मामले महीनों चलते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है: झूठी
शिकायतों पर क्या सजा? 2012 के नियमों में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था,
लेकिन 2026 के विनियम में इसे पूरी तरह हटा दिया गया। उदाहरण लीजिए—कोई छात्र नोट्स
मांगता है और न मिलने पर 'भेदभाव' की शिकायत कर देता है। 15 दिनों में आरोपी छात्र
निलंबित या निष्कासित हो सकता है। जांच में निर्दोष साबित होने पर भी शिकायतकर्ता को
कोई सजा नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रावधान दुरुपयोग को आमंत्रित कर रहा है,
खासकर कैंपस की प्रतिस्पर्धी माहौल में जहां निजी दुश्मनियां भेदभाव के आरोपों में
तब्दील हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट में PIL: संवैधानिक
चुनौती
इस विनियम के खिलाफ 23 जनवरी
को वकील दिव्या गंधोत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की। याचिका में दावा किया गया
है कि यह नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का स्पष्ट
उल्लंघन है। इन तीन अनुच्छेदों को संविधान का 'स्वर्णिम त्रिभुज' (Golden
Triangle) कहा जाता है, जो किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा का आधार हैं।
अनुच्छेद 14 के तहत सभी को कानून के समक्ष समानता मिलनी चाहिए, लेकिन समिति की संरचना
सामान्य वर्ग को हाशिए पर धकेलती है। अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित कर
सकता है, क्योंकि प्रोफेसर कम अंक देने या छात्र बहस करने से हिचकिचाएंगे। अनुच्छेद
21 के तहत 15-दिन की जांच करियर को नुकसान पहुंचा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी सुनवाई
की तारीख नहीं दी, लेकिन मामला गरमाता जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि
यदि कोर्ट हस्तक्षेप करता है, तो झूठी शिकायतों पर दंड जोड़ने और समिति में संतुलित
प्रतिनिधित्व जैसे सुधार संभव हैं। सोशल मीडिया पर #UGCRollback जैसे हैशटैग
वायरल हो रहे हैं, जो सामान्य वर्ग के असंतोष को दर्शाते हैं।
सिक्के का दूसरा पहलू: संभावित
फायदे
निष्पक्ष विश्लेषण में विनियम
के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं।
पहला, वास्तविक सुरक्षा: आरक्षित वर्ग के छात्रों को
एडमिशन, हॉस्टल आवंटन, परीक्षा केंद्र और कक्षाओं में भेदभाव से मुक्ति मिल सकती है।
कई मामलों में ये शिकायतें दब जाती थीं, अब EOC उन्हें तुरंत संबोधित करेगा।
दूसरा, कैंपस मॉनिटरिंग: सालाना रिपोर्टिंग से रैगिंग,
बुलिंग और जातिगत हिंसा में कमी आ सकती है।
तीसरा, दिव्यांगों के लिए न्याय: रैंप, काउंसलिंग और विशेष सुविधाएं
अब कागजों से निकलकर जमीनी हकीकत बन सकती हैं। यदि ईमानदार कार्यान्वयन हो, तो कैंपस
अधिक समावेशी हो सकता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी कहा,
"यह संविधान की भावना के अनुरूप है और दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा। सुप्रीम
कोर्ट की निगरानी में सब ठीक रहेगा।"
असली खतरे: नुकसान और दुरुपयोग
की आशंका
फायदों के बावजूद, नुकसानों की
सूची लंबी है।
पहला, झूठी शिकायतों का मैदान: SC/ST एक्ट के दुरुपयोग की
तरह यहां 'आरोप लगते ही सजा' का खतरा है। 2012 नियमों से दंड हटाने से शिकायतें हथियार
बन सकती हैं।
दूसरा, सामान्य वर्ग की अनदेखी: समिति में उनका कम प्रतिनिधित्व
पक्षपात को जन्म देगा। OBC और दिव्यांग के शामिल होने से टकराव बढ़ेगा।
तीसरा, डर का माहौल: छात्र सोचेंगे—नोट्स शेयर करें
या नहीं? प्रोफेसर मार्किंग में सतर्क रहेंगे।
चौथा, संस्थानों की मजबूरी: फंडिंग कटने के डर से प्राचार्य
शिकायतकर्ता का पक्ष लेंगे। बिहार जैसे राज्यों में, जहां उच्च शिक्षा पहले से चुनौतीपूर्ण
है, यह कैंपस संस्कृति को नष्ट कर सकता है।
ताजा अपडेट और भविष्य की दिशा
मंत्री प्रधान का बयान आश्वासन
देता है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। UGC ने अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। विशेषज्ञ
सुझाते हैं—झूठी शिकायत पर दंड जोड़ें, जांच में स्वतंत्र सदस्य रखें, और सामान्य वर्ग
को समिति में स्थान दें। सुप्रीम कोर्ट का फैसला निर्णायक होगा। बिहार के कॉलेजों में
छात्र संगठन विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।
निष्कर्ष:
UGC विनियम का इरादा नेक लगता
है—भेदभाव रोकना। लेकिन डिजाइन में खामियां इसे 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' की ओर ले जा
रही हैं। समानता तभी सच्ची होगी जब सभी वर्ग सुरक्षित हों। क्या यह समता है या सामान्य
वर्ग का सफाया? आपका क्या विचार है?
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