कोलकाता/पूर्णिया: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता
में आज एक ऐसा राजनीतिक और संवैधानिक गतिरोध देखने को मिला, जिसने देश के सियासी गलियारों
में हलचल मचा दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा चुनावी रणनीतिकार संस्था I-PAC
के कार्यालय और इसके वर्तमान प्रमुख प्रतीक जैन के आवास पर की गई छापेमारी ने न केवल
बंगाल की सत्ताधारी पार्टी TMC, बल्कि बिहार की राजनीति में सक्रिय प्रशांत किशोर
(PK) के लिए भी भविष्य की चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।
छापेमारी और मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप
घटनाक्रम की शुरुआत आज सुबह हुई
जब ED की टीम ने 2020 के बहुचर्चित कोयला तस्करी मामले (Coal Smuggling Case) और उससे
जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में कोलकाता स्थित I-PAC दफ्तर पर धावा बोला।
लेकिन स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद प्रतीक जैन के घर
पहुँच गईं। न्यूज़ कैमरों में कैद हुए विजुअल्स में मुख्यमंत्री को वहां से एक 'हरे
रंग की फाइल' और एक CD लेकर निकलते देखा गया। ED ने आरोप लगाया है कि यह जांच प्रक्रिया
में सीधा हस्तक्षेप और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ है, जबकि मुख्यमंत्री ने इसे अपनी
पार्टी की 'चुनाव रणनीति' को बचाने की कवायद बताया है।
प्रशांत किशोर और 'टाइमलाइन'
का पेंच
भले ही प्रशांत किशोर आज बिहार
की गलियों में 'जन सुराज' की पदयात्रा के माध्यम से अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार कर
रहे हों, लेकिन कोलकाता की इस रेड ने उनकी पुरानी भूमिकाओं को फिर से चर्चा में ला
दिया है। ED की यह जांच 2020 के वित्तीय लेनदेन पर केंद्रित है। गौरतलब है कि
2020-21 के दौरान प्रशांत किशोर I-PAC के सर्वेसर्वा और मुख्य रणनीतिकार थे।
कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है
कि PMLA (मनी लॉन्ड्रिंग कानून) के तहत जांच 'अपराध के समय' (Time of Offence)
पर आधारित होती है। चूंकि उस समय प्रशांत किशोर संस्था के मार्गदर्शक और निर्णायक भूमिका
में थे, इसलिए यदि I-PAC के खातों में 'कोयले के काले धन' की आवक साबित होती है, तो
जवाबदेही की सुई स्वाभाविक रूप से PK की ओर घूम सकती है।
वोटर आईडी और पते का कानूनी फंदा
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला
तथ्य प्रशांत किशोर का कोलकाता से जुड़ाव है। सार्वजनिक रिकॉर्ड और चर्चाओं के अनुसार,
PK का एक वोटर आईडी कार्ड उसी पते पर पंजीकृत पाया गया था जहाँ I-PAC का मुख्यालय स्थित
है। कानूनी रूप से यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साबित करता है कि वे केवल
एक 'विजिटिंग सलाहकार' नहीं थे, बल्कि संस्था के अभिन्न अंग के रूप में वहां निवास
कर रहे थे। PMLA की धारा 50 ED को यह शक्ति देती है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को तलब
कर सके जो संबंधित कालखंड में संस्था के कामकाज का हिस्सा रहा हो।
विश्लेषण: राजनीति, रणनीति और
साख की लड़ाई
इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण
करें तो यह केवल एक भ्रष्टाचार की जांच नहीं, बल्कि साख की लड़ाई भी है। प्रशांत
किशोर ने 2021 में चुनावी रणनीति से 'संन्यास' लेकर खुद को एक शुद्ध राजनीतिज्ञ के
रूप में बिहार में पेश किया है। हालांकि, I-PAC पर पड़ा यह छापा उनकी उस 'क्लीन इमेज'
के लिए खतरा बन सकता है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें
तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का 'हरी फाइल' को बचाने के लिए खुद मैदान में उतरना यह
संकेत देता है कि उस फाइल में मौजूद डेटा या दस्तावेज वर्तमान और पुराने दोनों ही दौर
के लिए संवेदनशील हो सकते हैं। यदि ED इस मामले में 'मनी ट्रेल' स्थापित करने
में सफल रहती है, तो प्रशांत किशोर के लिए कानूनी चुनौतियों के साथ-साथ नैतिक संकट
भी खड़ा होगा। बिहार में 'जन सुराज' के जरिए शुचिता की राजनीति का दावा करने वाले
PK के लिए 'कोयले के ये दाग' धोना आसान नहीं होगा। फिलहाल, सबकी नजरें कलकत्ता हाई
कोर्ट पर टिकी हैं, जहाँ ED ने मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के खिलाफ गुहार लगाई है।
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डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध मीडिया
रिपोर्ट्स और सार्वजनिक तथ्यों पर आधारित एक विश्लेषण है। GPNBihar किसी भी व्यक्ति
को दोषी करार नहीं देता; अंतिम निर्णय माननीय न्यायालय और जांच एजेंसियों के अधीन है।
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