डॉ. गौतम पाण्डेय का विश्लेषण:

भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा सिर्फ सुरक्षा या सीमा प्रबंधन का विषय नहीं रह गया है—यह अब राजनीति, वोट बैंक, अदालत और मानवाधिकार संगठनों के बीच एक जटिल टकराव बन चुका है। सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों कुछ राजनीतिक दलों और दिग्गज वकीलों की पूरी कोशिश रहती है कि घुसपैठ कर आए लोग “भारत के ही नागरिक” साबित हो जाएँ? और अदालतें ऐसे मामलों को तुरंत खारिज करने के बजाय लंबी सुनवाई क्यों करती हैं? इन्हीं सवालों के जवाब हम गहराई से समझेंगे।

 

वोट बैंक की राजनीति: आखिर कौन-सी मजबूरी है?

भारत की राजनीति में लंबे समय से यह धारणा रही है कि पूर्वी भारत—विशेषकर असम, बंगाल और त्रिपुरा—में रह रहे बांग्लादेशी मूल के लोगों का एक बड़ा हिस्सा चुनावी हिसाब से बेहद महत्वपूर्ण है। कई छोटे-बड़े राजनीतिक दलों के लिए ये आबादी संभावित वोट बैंक बन जाती है। यही कारण है कि कुछ दल इनके पक्ष में खुलकर आते हैं और हर मंच पर इन्हें “भारतीय नागरिक” साबित करने का प्रयास करते हैं।

 

कई बार यह भी देखने को मिलता है कि स्थानीय स्तर पर ये लोग मजदूरी, वोट और जमीन से जुड़ी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगते हैं। ऐसे में राजनीतिक दल चाहकर भी इनके खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाते। असम NRC के दौरान लाखों नाम हटने और जुड़ने के विवाद के बीच भी कई दल सार्वजनिक रूप से कहते रहे कि “बहुत से असली भारतीय नागरिकों को गलती से विदेशी बता दिया गया है।” इस तर्क के पीछे राजनीतिक लाभ का बड़ा हिसाब-किताब छिपा होता है।

 

दिग्गज वकील ऐसे केस क्यों लड़ते हैं?

वरिष्ठ वकीलों और सुप्रीम कोर्ट स्तर की लॉबी का भी इस मुद्दे पर स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है। कई दिग्गज वकील मानवाधिकार आधारित राजनीति से जुड़े होते हैं। वे मानते हैं कि सरकारें राजनीतिक कारणों से कुछ समुदायों को “घुसपैठिया” बताकर परेशान करती हैं। यही कारण है कि वे कोर्ट में खड़े होकर बार-बार यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि ये लोग बांग्लादेशी नहीं, बल्कि भारत के स्थायी निवासी हैं।”

 

दूसरी ओर, कई अंतरराष्ट्रीय और भारतीय NGOs इन मामलों को “मानवाधिकार उल्लंघन”, “शरणार्थी अधिकार” और “धार्मिक उत्पीड़न” के आधार पर लड़ती हैं। इन्हें बाहरी फंडिंग भी मिलती है और कई बड़े वकील इनके behalf पर केस लेते हैं। इसलिए, जब सीमा-पार घुसपैठियों पर कार्रवाई होती है, तो ये वकील तुरंत कानूनी लड़ाई शुरू कर देते हैं।

 

अदालतें ऐसे केस जल्दी खारिज क्यों नहीं करतीं?

अदालत की सबसे बड़ी मजबूरी है — न्याय का सिद्धांत। भारतीय संविधान कहता है कि यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि वह भारतीय नागरिक है, तो अदालत उसे बिना सुने, बिना जांचे नागरिकता से वंचित नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इस सिद्धांत का कड़ाई से पालन करते हैं।

किसी को “घुसपैठिया” साबित करना कानूनी रूप से उतना आसान नहीं है जितना राजनीतिक भाषणों में लगता है। इसके लिए सरकार को प्रमाण जुटाने होते हैं—

  • सीमा पार प्रवेश रिकॉर्ड,
  • जन्म/स्कूल दस्तावेज,
  • मतदाता सूची इतिहास,
  • पूर्वजों की पहचान,
  • जिला प्रशासन की रिपोर्ट।

ये सभी प्रक्रियाएँ समय लेती हैं। कोर्ट यह जोखिम नहीं ले सकता कि किसी को गलती से विदेशी घोषित कर दिया जाए और बाद में उसके जीवन पर गंभीर असर पड़े। इसी वजह से कोर्ट इस तरह के मामलों में अत्यधिक सावधानी बरतता है।

 

केस लंबा क्यों चलता है और कोर्ट देरी क्यों करता है?

Border security forces, स्थानीय पुलिस, प्रशासन, विदेश मंत्रालय और कई बार बांग्लादेश सरकार से भी सत्यापन की आवश्यकता पड़ती है। एक-एक फाइल में 10–15 रिपोर्टें होती हैं। इसके अलावा NGOs और राजनीतिक दल बार-बार नई याचिकाएँ दाखिल करते रहते हैं। जब Court को दिखता है कि मामला “मानवाधिकार” और “नागरिकता सत्यापन” से जुड़ा है, तो वह उसे प्राथमिकता और गंभीरता दोनों के साथ लेता है। इसलिए केस कई महीनों से लेकर कई साल तक चल जाते हैं।

 

विश्लेषण: क्या यह सिर्फ कानूनी मामला है या राजनीतिक खेल?

वास्तव में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भारत की सबसे जटिल राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं में से एक है। यह केवल कानून का मामला नहीं है, बल्कि इस पर राजनीति, जनसंख्या संतुलन, सुरक्षा और चुनावी गणित का गहरा असर है। पूर्वी भारत में यह एक जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Shift) का विषय बन चुका है, जिसे कई विशेषज्ञ “साइलेंट इन्वेज़न” तक कहते हैं। लेकिन दूसरी ओर कुछ दलों के लिए यही आबादी भविष्य का स्थायी वोट बैंक है।

 

अदालतें पूरी तरह कानूनी दायरे में रहती हैं और मानती हैं कि गलत नागरिकता निर्णय किसी व्यक्ति के जीवन को बर्बाद कर सकता है। लेकिन राजनीति इस मुद्दे को बिल्कुल अलग नजरिए से देखती है—

  • कुछ दल वोट बैंक सुरक्षित रखना चाहते हैं।
  • कुछ दल सुरक्षा और अवैध जनसंख्या को लेकर चिंतित हैं।
  • वकीलों और NGOs की मानवाधिकार राजनीति भी इस बहस को और उलझा देती है।

इसका नतीजा यह होता है कि चाहे सरकार कितनी भी सख्ती दिखाए, मामला अदालत में अटक जाता है। और अदालत में राजनीतिक हस्तक्षेप भले प्रत्यक्ष न हो, लेकिन लॉबीइंग और वैचारिक समूहों का दबाव मौजूद रहता है। यही कारण है कि बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा कभी खत्म नहीं होता—बल्कि हर चुनाव के साथ और ज्यादा गर्म हो जाता है।

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लेखक GPNBihar के प्रधान संपादक हैं।


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राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर तथ्य-आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना इनकी विशेष पहचान है।

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