मोदी जी को अब तक 28 देशों के राजकीय सम्मान से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा 5 देशों के 'शहर की कुंजी' सम्मान और अन्य 10 पुरस्कार भी मिल चुके हैं, जिसमें संयुक्त राष्ट्र का 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' सम्मान भी शामिल है। कई पत्र-पत्रिकाओं ने भी उन्हें सम्मानित किया है। हाल ही में इथियोपिया और ओमान ने भी अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दिया है।

 

यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य है भारत में जो लोग और खासकर विपक्ष के नेता, मोदी जी पर हिंदू-मुस्लिम विभाजन का आरोप लगाते हैं, उन्हीं मोदी जी को दुनिया के लगभग 9 मुस्लिम देशों ने प्रथम श्रेणी के राजकीय सम्मान दिए हैं, जिसमें सऊदी अरब और यूएई शामिल हैं। क्या वहां के लोग इतने नासमझ हैं कि एक 'हिंदू-मुस्लिम करने वाले' प्रधानमंत्री को सम्मानित कर रहे हैं? ऐसा पहले के किसी प्रधानमंत्री के साथ क्यों नहीं हुआ? सोचना चाहिए उन्हें…

 

मोदी जी ने सभी सम्मानों को देश और इसके 140 करोड़ लोगों को समर्पित किया है। यह उनकी विनम्रता को दर्शाता है।

लेकिन, असल सवाल यहाँ से शुरू होता है

इन सम्मान का लाभ किसे?

क्या इन पुरस्कारों से गरीब का पेट भर जाएगा?

बेरोजगारी कम हो जाएगी?

महँगाई गिर जाएगी?

दिल्ली का प्रदूषण हट जाएगा?

जवाब हैनहीं।

और यही वह बिंदु है जिस पर चर्चा ज़रूरी भी है और कठिन भी।

परन्तु, ऐसा हो नहीं रहा है -

क्योंकि जवाब किसी के पास नहीं।

 

विदेश यात्राओं का खर्च और परिणाम

मोदी जी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक लगभग 59 देशों का दौरा कर चुके हैं, जिसमें अनुमानित 4,870 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

लेकिन सवाल है

भारत को मिला क्या?

क्या आम भारतीयों का जीवन थोड़ा आसान हुआ?

क्या दैनिक समस्याओं में कमी आई?

 

सच्चाई यह है कि

लोग आज भी प्रदूषण से जूझ रहे हैं,

महँगाई से पिस रहे हैं,

और बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है।

इसका कोई हल नहीं निकला।

 

विपक्ष और संसद की बर्बादी

बात सिर्फ मोदी जी की नहीं, विपक्ष की भी है। संसद में आए दिन हंगामा होता है। जरूरी काम नहीं होते, किसी बिल पर सार्थक बहस नहीं होती। विपक्ष वाकआउट कर जाता है, नतीजा—बिना चर्चा के बिल पास हो जाते हैं। कभी हंगामा इतना बढ़ जाता है कि सदन की कार्यवाही रुक जाती है।

सोचिए-

साल में सिर्फ तीन बार कुछ दिनों के लिए सदन चलता है, उसमें भी अड़ंगा डाला जाता है। पक्ष और विपक्ष दोनों की यही स्थिति है। अपनी गलतियां कोई मानना ही नहीं चाहता, तो सुधार कैसे होगा?

 

संसद चलाने का खर्च – जनता के पैसों पर राजनीति

क्या आप जानते हैं कि संसद के एक सदन को चलाने में हर मिनट 2.50 लाख रुपये खर्च होते हैं, यानी एक घंटे में 1.50 करोड़? सदन प्रतिदिन 6 घंटे चलता है, मतलब 9 करोड़ रुपये रोज का खर्च। ज्यादातर ये पैसे बर्बाद हो जाते हैं, क्योंकि कोई सार्थक आउटपुट नहीं निकलता। हमारे माननीयों को इसकी चिंता नहीं। सभी अपनी ईगो लेकर बैठे हैं—'हम किसी से कम नहीं।' वे यह नहीं सोचते कि यह खर्च आम जनता की जेब से जाता है, न कि उनकी। माननीयों को टैक्स देना नहीं पड़ता, हम देते हैं—और वह भी बार-बार। टैक्स पर टैक्स। कभी ध्यान दिया कि टैक्स-पेड पैसे से सामान खरीदें तो फिर टैक्स क्यों? लेकिन उन्हें क्या फिक्र—सांसद बन गए तो मजे ही मजे।

 

हालिया संसदीय मुद्दे: ‘प्रदूषण’ से ‘मनरेगा’ और ‘जी राम जी’ कार्यक्रम तक

18 दिसंबर को संसद में दिल्ली प्रदूषण पर चर्चा होनी थी—एक ऐसा मुद्दा जो आम जनता से जुड़ा है। लोग दिल्ली में घुट रहे हैं। लेकिन उसे टाल दिया गया। चर्चा हुई जी राम जी कार्यक्रम पर, जिसका अभी कोई तात्कालिक औचित्य नहीं था। मनरेगा चल रहा था, चलने देते। घोटाले हो रहे थे, तो रोकने की कोशिश करते। खामखां नया मुद्दा क्यों? सरकार को पता था कि विपक्ष अड़ंगा लगाएगा, लेकिन असल में प्रदूषण पर बात ही नहीं करनी थी। अभी दिल्ली और केंद्र दोनों में भाजपा की सरकार है। जनता और विपक्ष दोनों घेर रहे हैं, जवाब नहीं मिल रहा, इसलिए यह मुद्दा लाया गया।

 

वंदे मातरम् विवाद – कैसे और क्यों?

पिछले दिनों वंदे मातरम पर संसद में गरमागरम बहस हुई। यह मुद्दा कहां से आ गया? किसे परहेज है वंदे मातरम से? जिसे है, उसे लाख कहो तो भी नहीं बोलेगा। संविधान में कहीं नहीं लिखा कि सबको बोलना पड़ेगा। संविधान के जानकार इसे स्पष्ट कर सकते हैं। हर नेता संविधान को अपने अनुसार पढ़ता और इस्तेमाल करता है। संविधान के पहले पन्ने पर भगवान राम की फोटो है, तो क्या सब उनकी पूजा करते हैं? यह सब बे-सिर-पैर की बातें हैं।

 

प्रियंका गांधी का बयान और नेहरू परिवार  – एक सच्चाई

पिछले दिनों प्रियंका गांधी का एक बयान अच्छा लगा। उन्होंने कहा कि एक बार चर्चा कर लो—नेहरू, इंदिरा और राजीव की गलतियां क्या-क्या थीं। 10-20-30-40 घंटे बहस करो और मुद्दा खत्म करो। फिर महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, प्रदूषण पर बात करो। बात सही कही। उनकी हिम्मत की दाद देता हूं कि सदन में ऐसा बोलीं। आज तक किसी कांग्रेसी नेता की हिम्मत नहीं हुई। लेकिन सवाल यह है कि नेहरू परिवार या गांधी परिवार से व्यक्तिगत परेशानी किसी को नहीं - परेशानी उनके पद से है। प्रधानमंत्री रहते उनके कार्यों का अच्छा-बुरा परिणाम भारत भुगत रहा है। इस पर चर्चा होती रहेगी—जब तक भारत और सनातन रहेगा। कांग्रेस इससे भाग नहीं सकती, मुक्त नहीं हो सकती।

 

सरकार और विपक्ष दोनों को आत्मचिंतन चाहिए

लेकिन सवाल यह भी कि कब तक मोदी सरकार कांग्रेस को कोसती रहेगी? संसद का समय और जनता की गाढ़ी कमाई बर्बाद करती रहेगी? आजकल सरकार ऐसे मुद्दे ढूंढ लाती है जिनकी जरूरत ही नहीं। शायद जानबूझकर बड़े मुद्दों को छिपाने के लिए छोटे मुद्दे उछाले जाते हैं, ताकि बहस न हो। विरोध-गतिरोध चलता रहे।

क्योंकि-

अगला चुनाव अभी दूर है

तब की राजनीति तब देखी जाएगी।

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(लेखक GPNBihar के प्रधान संपादक हैं।)

 

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