पूर्णिया | शनिवार, 07 फरवरी 2026 | दोपहर 12 बजे

शनिवार की दोपहर रामबाग चौक एक बार फिर महाजाम का गवाह बना। जाम इतना भीषण कि पैदल चलना आसान था, लेकिन टोटो, ऑटो, कार और मोटरसाइकिल सवारों के लिए एक-एक मीटर आगे बढ़ना किसी परीक्षा से कम नहीं। यात्री हकलान थे, धैर्य टूट रहा था और सबसे बड़ी बात—जाम किस वजह से लगा, यह किसी को स्पष्ट तौर पर पता नहीं था।

 

कुछ देर बाद कारण सामने आया—मिल्लिया कॉन्वेंट को इंटरमीडिएट परीक्षा का केंद्र बनाया गया है। परीक्षा केंद्र पर विद्यार्थियों की भीड़ और उनके साथ आए अभिभावकों की गाड़ियों का हुजूम आसपास की गलियों पर टूट पड़ा। हालत यह रही कि गली में जहां नज़र जाए, वहीं मोटरसाइकिल और कारें खड़ी दिखीं। आधे से अधिक सड़क दोनों ओर से घिरी हुई थी। स्कूल प्रशासन ने पार्किंग की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं की थी, न ही वैकल्पिक स्थान चिन्हित किए गए थे। ऐसे में विद्यार्थियों और अभिभावकों के पास गलियों और संकरी सड़कों के दोनों ओर वाहन खड़े करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

 

नतीजा स्वाभाविक था। एक टोटो इधर से आया, दूसरा उधर से—और जाम लग गया। बीच की गलियों से रामबाग मुख्य सड़क पर निकलना लगभग असंभव हो गया। आगे-पीछे ट्रैक्टर, टैंपो, ऑटो, टोटो और मोटरसाइकिलों की लंबी कतारें—कहीं कोई समन्वय नहीं, कोई नियंत्रण नहीं। हालात इतने खराब थे कि रामबाग रेलवे गुमटी से लेकर भूतनाथ मंदिर तक यातायात ठप हो गया। रामबाग चौक से बिहार टॉकीज रोड तक पहुंचने में लोगों को एक घंटे से अधिक का समय लग गया।

 

जाम को और भयावह बनाने में लोगों की ट्रैफिक सेंस की कमी ने भी अहम भूमिका निभाई। जहां थोड़ी सी खाली जगह दिखी, वहीं गाड़ी घुसा दी—चाहे वह कार ही क्यों न हो। बाईं ओर जाम था तो दाईं ओर की थोड़ी सी खुली जगह पर कब्जा कर लिया गया, यह सोचे बिना कि सामने से आने वाला कैसे निकलेगा। “मुझे निकलना है, बाकी जाएं भाड़ में”—यही मानसिकता जाम की सबसे बड़ी ईंधन बनी।

 

अब सवाल उठता है—इस अव्यवस्था का जिम्मेदार कौन है? पुलिस प्रशासन या स्कूल प्रशासन?

क्या स्कूल प्रशासन ने समय रहते ट्रैफिक पुलिस को यह सूचना दी थी कि उनके यहां परीक्षा केंद्र है और भीड़ उमड़ेगी? यदि सूचना दी गई थी, तो पुलिस ने पहले से यातायात प्रबंधन क्यों नहीं किया? डायवर्जन, बैरिकेडिंग, अस्थायी पार्किंग या अतिरिक्त बल की व्यवस्था क्यों नहीं दिखी? और यदि सूचना नहीं दी गई थी, तो यह गंभीर लापरवाही नहीं तो और क्या है?

 

इससे भी बड़ा प्रश्न परीक्षा बोर्ड पर उठता है। क्या किसी स्कूल को परीक्षा केंद्र के रूप में अनुमोदित करते समय यह नहीं देखा जाना चाहिए कि वहां पार्किंग और यातायात प्रबंधन की न्यूनतम व्यवस्था है या नहीं? संकरी गलियों और घनी आबादी वाले इलाके में स्थित स्कूल को बिना ठोस ट्रैफिक प्लान के परीक्षा केंद्र बनाना, क्या पहले से समस्या को न्योता देना नहीं है?

 

यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि यह विरोध स्कूल के अस्तित्व या उसकी प्रतिष्ठा के खिलाफ नहीं है। मिल्लिया स्कूल रामबाग मोहल्ले की शान रहा है। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि स्कूल की वजह से ही यह इलाका फला-फूला। लेकिन शान के साथ जिम्मेदारी भी आती है। मोहल्ले के आम नागरिकों को हर परीक्षा के दौरान घंटों जाम में फंसने को मजबूर करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

 

यह वक्त भावनाओं से नहीं, व्यवस्था से सोचने का है। स्कूल प्रशासन, पुलिस प्रशासन और परीक्षा बोर्ड—तीनों को मिलकर ठोस योजना बनानी होगी। परीक्षा के दिनों में अलग पार्किंग स्थल, स्पष्ट ट्रैफिक रूट, पुलिस की तैनाती और स्थानीय निवासियों को पहले से सूचना—ये कोई असंभव मांग नहीं हैं।

यदि अब भी मुस्तैदी नहीं बरती गई, तो हर परीक्षा के साथ रामबाग एक बार फिर “जाम का परीक्षा केंद्र” बनता रहेगा—और इस परीक्षा में हर बार फेल होंगे आम नागरिक।

 

विश्लेषण

रामबाग चौक पर लगा महाजाम किसी एक दिन या एक परीक्षा की समस्या नहीं, बल्कि शहरी प्रशासन की पुरानी और लगातार अनदेखी का परिणाम है। यह घटना साफ दिखाती है कि हमारे शहरों में शिक्षा, यातायात और नागरिक सुविधा—तीनों के बीच समन्वय का गंभीर अभाव है। परीक्षा जैसे पूर्व-निर्धारित आयोजन के बावजूद न तो स्कूल प्रशासन ने पार्किंग और भीड़ प्रबंधन की ठोस व्यवस्था की और न ही ट्रैफिक प्रशासन की मौजूदगी समय पर प्रभावी रूप में दिखी।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसी स्थितियाँ हर साल, हर बड़ी परीक्षा में दोहराई जाती हैं, फिर भी कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता। परीक्षा केंद्र को स्वीकृति देते समय बोर्ड द्वारा बुनियादी ढांचे, पार्किंग क्षमता और सड़क की चौड़ाई जैसे पहलुओं की अनदेखी, समस्या की जड़ में है। इसका खामियाजा आम नागरिकों को घंटों जाम में फँसकर भुगतना पड़ता है।

वहीं दूसरी ओर, आम लोगों में ट्रैफिक अनुशासन की कमी भी हालात को और बिगाड़ देती है। “जहाँ जगह दिखी, वहीं गाड़ी घुसा दी” वाली मानसिकता जाम को विकराल बना देती है। यह घटना बताती है कि समाधान केवल पुलिस या स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बोर्ड, स्थानीय प्रशासन और नागरिकों—सभी की सामूहिक जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। जब तक पूर्व-योजना और जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसे जाम सामान्य होते रहेंगे।