“संसद में गुंडागर्दी”

भारतीय लोकतंत्र में संसद को सर्वोच्च मंच माना जाता है—वह मंच जहाँ देश की जनता के प्रश्न उठते हैं, नीतियों पर बहस होती है और सरकार से जवाबदेही तय की जाती है। संविधान ने संसद को गरिमा, अनुशासन और मर्यादा का प्रतीक माना है। लेकिन हाल के वर्षों में संसद सत्रों के दौरान जो दृश्य सामने आए हैं, उन्होंने इस आदर्श छवि को गहरे प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा किया है। बार-बार हंगामा, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाज़ी, माइक तोड़ने की कोशिशें, वेल में आना और कार्यवाही ठप कर देना—इन सबको देख कर “संसद में गुंडागर्दी” जैसा कठोर शब्द प्रयोग में आने लगा है।

यह लेख किसी भी राजनीतिक दल या नेता के पक्ष अथवा विपक्ष में नहीं है। इसका उद्देश्य केवल वही दर्ज करना है, जो वास्तव में संसद के भीतर घटित हुआ और जो जनता ने अपनी आँखों से देखा।

 

संसद का उद्देश्य और वर्तमान व्यवहार

संसद का मूल उद्देश्य कानून निर्माण, नीतिगत चर्चा और जनहित से जुड़े मुद्दों पर संवाद है। सत्तापक्ष का दायित्व होता है कि वह अपने निर्णयों का तर्क दे, जबकि विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सवाल पूछे, कमियाँ उजागर करे और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करे। लेकिन व्यवहार में अक्सर देखा गया है कि संसद सत्र का बड़ा हिस्सा हंगामे की भेंट चढ़ जाता है।

कभी विपक्ष सरकार पर जवाब न देने का आरोप लगाता है, तो कभी सरकार विपक्ष पर संसद को बाधित करने का दोष मढ़ती है। परिणाम यह होता है कि प्रश्नकाल स्थगित होता है, ज़रूरी विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं या पूरे सत्र में कोई सार्थक बहस ही नहीं हो पाती।

 

अनर्गल बातें और अनावश्यक मुद्दे

संसद में बहस का स्तर भी एक बड़ा प्रश्न बन चुका है। कई बार राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के बजाय ऐसे विषय उठाए जाते हैं जिनका सीधा संबंध न तो जनहित से होता है और न ही विधायी प्रक्रिया से। व्यक्तिगत टिप्पणियाँ, पुराने बयान, चुनावी भाषणों की पुनरावृत्ति और सोशल मीडिया से उठे मुद्दे संसद के पटल तक पहुँच जाते हैं।

सदस्यों द्वारा एक-दूसरे पर चिल्लाना, तंज कसना और अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना अब असामान्य नहीं रह गया है। यह व्यवहार न केवल संसदीय गरिमा के विपरीत है, बल्कि जनता के उस विश्वास को भी ठेस पहुँचाता है जिसने अपने प्रतिनिधियों को वहाँ भेजा है।

 

प्रधानमंत्री का घेराव और प्रतीकात्मक विरोध

कई सत्रों में यह देखा गया कि विपक्षी सांसदों ने प्रधानमंत्री के वक्तव्य के दौरान नारेबाज़ी की, वेल में आकर घेराव किया या तख्तियाँ दिखाकर विरोध जताया। संसदीय परंपरा में विरोध का अधिकार हमेशा से रहा है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विरोध का यह तरीका संसद के भीतर होना चाहिए या संसद के बाहर?

प्रधानमंत्री का घेराव प्रतीकात्मक विरोध का माध्यम बन चुका है, जिसे विपक्ष सरकार की जवाबदेही तय करने का दबाव बताता है। वहीं सत्तापक्ष इसे संसद की कार्यवाही बाधित करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं का अपमान मानता है। सच्चाई यह है कि इन टकरावों में अक्सर संसद की कार्यवाही ठप हो जाती है और जनता से जुड़े मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।

 

व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप: शब्दों की मर्यादा का पतन

संसद में शब्दों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों में यह मर्यादा भी बार-बार टूटती दिखी है। एक उदाहरण में विपक्ष के एक प्रमुख नेता Rahul Gandhi द्वारा एक सत्तापक्षीय सांसद को “गद्दार” कहे जाने का आरोप सामने आया। इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई और सत्तापक्ष के नेता Ravneet Singh Bittu ने पलटवार करते हुए राहुल गांधी को “देश का दुश्मन” कह दिया।

ये शब्द केवल दो व्यक्तियों के बीच का विवाद नहीं थे, बल्कि संसद के भीतर बोले गए ऐसे वाक्य थे जिन्होंने पूरे सत्र का माहौल विषाक्त कर दिया। दोनों ही तरफ से दिए गए बयान बाद में विवाद, स्पष्टीकरण और विशेषाधिकार हनन जैसी प्रक्रियाओं में बदल गए। इस पूरे घटनाक्रम में यह प्रश्न अनुत्तरित रह गया कि क्या संसद व्यक्तिगत अपमान का मंच बन चुकी है?

 

सत्ता और विपक्ष: संसद न चलने देने की होड़

यह कहना गलत नहीं होगा कि संसद के ठप होने की जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर नहीं डाली जा सकती। कई सत्रों में विपक्ष ने मांगें न माने जाने पर कार्यवाही नहीं चलने दी, तो कई मौकों पर सरकार ने भी बिना व्यापक चर्चा के कार्यवाही आगे बढ़ाई।

विपक्ष का तर्क होता है कि जब तक सरकार जवाब नहीं देगी, तब तक संसद चलने देना जनहित के साथ समझौता होगा। वहीं सरकार का कहना होता है कि विपक्ष जानबूझकर हंगामा करता है ताकि विधायी कामकाज बाधित हो। इस टकराव में संसद का समय बर्बाद होता है, जिसका खामियाजा अंततः जनता को भुगतना पड़ता है।

 

लोकतंत्र की छवि और जनता का भरोसा

संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण आज हर नागरिक देख सकता है। जब लोग अपने प्रतिनिधियों को हंगामा करते, आरोप लगाते और कार्यवाही ठप करते देखते हैं, तो लोकतंत्र की छवि कमजोर होती है। युवाओं में यह संदेश जाता है कि बहस और संवाद की जगह शोर और टकराव ने ले ली है।

यह भी सच है कि संसद के भीतर जो होता है, वही राजनीतिक संस्कृति को दिशा देता है। यदि संसद में असहिष्णुता और आक्रामकता दिखेगी, तो वही प्रवृत्ति समाज में भी परिलक्षित होगी।

 

निष्कर्ष: सवाल व्यवस्था का है, व्यक्ति का नहीं

“संसद में गुंडागर्दी” कोई कानूनी शब्द नहीं, बल्कि उस निराशा की अभिव्यक्ति है जो जनता संसद की कार्यशैली को देखकर महसूस करती है। यह समस्या किसी एक पार्टी, नेता या विचारधारा की नहीं है। इसमें सत्ता और विपक्ष—दोनों की भूमिका है।

संसद का सम्मान तभी बचेगा जब उसके सदस्य यह स्वीकार करें कि असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अपमान और अव्यवस्था नहीं। सवाल पूछना ज़रूरी है, विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन संसद को ठप कर देना और व्यक्तिगत आरोपों में उलझ जाना देश के हित में नहीं है।

यदि संसद को सच में लोकतंत्र का मंदिर बनाए रखना है, तो उसे फिर से संवाद, तर्क और मर्यादा की राह पर लौटना होगा—वरना “संसद में गुंडागर्दी” जैसे शब्द केवल शीर्षक नहीं, बल्कि स्थायी पहचान बन सकते हैं।

 

विश्लेषण:

“संसद में गुंडागर्दी” विषय पर लिखा गया लेख भारतीय लोकतंत्र की एक गंभीर और असहज सच्चाई को सामने रखता है। यह विश्लेषण बताता है कि समस्या किसी एक दल, नेता या विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी संसदीय संस्कृति से जुड़ी हुई है। लेख निष्पक्ष रूप से यह दर्शाता है कि संसद, जो संवाद और नीति-निर्माण का सर्वोच्च मंच है, वह कई बार व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाज़ी और अव्यवस्था का केंद्र बन जाती है।

विश्लेषण का मुख्य बिंदु यह है कि संसद का बार-बार बाधित होना केवल राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का क्षरण है। जब अनावश्यक मुद्दे, तीखे शब्द और व्यक्तिगत टिप्पणियाँ प्रमुख हो जाती हैं, तो जनहित से जुड़े असली प्रश्न हाशिए पर चले जाते हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है और यह संदेश जाता है कि शोर, बहस पर भारी पड़ रहा है।

लेख यह भी रेखांकित करता है कि सत्ता और विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी समान है। विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन विरोध का तरीका मर्यादित होना चाहिए। निष्कर्षतः, यह विश्लेषण संसद की वर्तमान कार्यशैली पर आत्ममंथन की आवश्यकता को रेखांकित करता है और संकेत देता है कि यदि संवाद, संयम और जिम्मेदारी को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो लोकतंत्र की साख को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।

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डिस्क्लेमर

यह लेख संसद की कार्यवाही के दौरान सार्वजनिक रूप से सामने आए घटनाक्रमों, बयानों और दृश्यात्मक तथ्यों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, नेता या विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में प्रचार करना नहीं है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विश्लेषण हैं, जिनका लक्ष्य केवल संसदीय आचरण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विमर्श को सामने रखना है। किसी भी शब्द, उदाहरण या संदर्भ को व्यक्तिगत अपमान, दुर्भावना या आरोप के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

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