नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के नतीजे राज्य की राजनीतिक तस्वीर को नए सिरे से परिभाषित करते हैं। जनता ने 20 वर्षों से सत्ता में चल रही नीतीश कुमार की सरकार पर भरोसा जताया, जबकि विपक्ष की सभी संभावनाएं धरी की धरी रह गईं। खासकर कांग्रेस पार्टी को इस चुनाव में बड़ा झटका लगा। कांग्रेस ने लगभग 60 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद सिर्फ 6 सीटें जीत सकी। हार के बाद कांग्रेस ने एक विस्तार समीक्षा बैठक की, जिसमें नेताओं ने चुनाव परिणामों के पीछे कई चौंकाने वाली बातें साझा कीं।

 

चुनाव से पहले बिहार में चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में संशोधन के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चलाया। इस अभियान के तहत मतदाता सूची से नाम कटे और जोड़ भी हुए। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के तहत उनके वोटर्स के नाम हटाए गए ताकि चुनाव पर असर डाला जा सके। केंद्र सरकार को भी बीजेपी के जरिए इस प्रक्रिया से जोड़ दिया गया। चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच इस मुद्दे को लेकर तीखी बयानबाजी हुई। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर ‘वोट चोरी’ का अभियान चलाया और वोटर्स अधिकार यात्रा भी निकाली। राहुल गांधी समेत तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन सहित कई बड़े नेता इसमें शामिल हुए।

हालांकि, विपक्ष का यह जोर वोटरों के वास्तविक मुद्दों जैसे बिजली, पानी, शिक्षा, सुरक्षा आदि से कट गया। जनता ने ऐसे महत्त्वपूर्ण जनसमस्याओं को देखकर सरकार पर भरोसा जताया। यही वजह रही कि तेजस्वी यादव-राहुल गांधी की जोड़ी को चुनाव में करारी शिकस्त मिली।

 

हार के बाद कांग्रेस ने एक चौथे घंटे तक चली समीक्षा बैठक की। कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर इस बैठक की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बैठक में एक बात स्पष्ट हुई कि बिहार चुनाव असली जनमत नहीं था, बल्कि मैनेज्ड और मनमुताबिक परिणाम घोषित किया गया। नेताओं ने बताया कि SIR के जरिए चुनिंदा वोटर नामों को हटाया गया और संदिग्ध नाम जोड़े गए। एमएमआरवाई योजना के नाम पर खुलेआम पैसे बांटे गए ताकि वोटरों को प्रभावित किया जा सके। अनेक सीटों पर परिणाम इतने घनिष्ट अंतर से आए कि चुनाव आयोग भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता था।

 

वहीं, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता चुनाव रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी ने चुनाव में महंगाई, बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार जैसी असली समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया। विपक्ष का पूरा जोर केवल SIR और वोट चोरी के मुद्दों पर था, जिससे आम जनता तक पार्टी का संदेश नहीं पहुंच पाया और भारी नुकसान हुआ।

 

कांग्रेस के स्थानीय पदाधिकारियों ने हार के कुछ प्रमुख कारण गिनाए। उन्होंने बताया कि सरकार ने महिलाओं को ₹10,000 की मदद देने जैसी योजनाएं चालू कीं, जो बहुमत के बीच लोकप्रिय रहीं। इसके अलावा बूथ स्तर पर गड़बड़ियां और गठबंधन दलों के बीच तालमेल की कमी भी हार की बड़ी वजह बनी। कई नेताओं ने AIMIM का सीमांचल क्षेत्र में अल्पसंख्यक वोट बंटवारे के लिए भी दोष लगाया।

 

कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने चुनाव को प्रभावित करने के लिए SIR, EVM में गड़बड़ी, मतदाता खरीदने और प्रशासनिक दबाव जैसे कई हथकंडे अपनाए। हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल ने अलग-अलग बैचों में लगभग 70 उम्मीदवारों और सांसदों से चर्चा की। बैठक से पहले दो हारने वाले उम्मीदवारों में टिकट वितरण को लेकर तीखी बहस भी हुई, जिसमें बाहरी लोगों को टिकट देने पर असहमति बनी।

 

टिकट चयन प्रक्रिया पर भी सवाल उठे। एक नेता ने पूछा कि 2019 लोकसभा चुनाव हार की जिम्मेदारी किसने ली और क्या राज्य में भी उसी तरह जिम्मेदारी तय होगी? यह अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के राज्य प्रभारी कृष्ण अल्लावरु पर निशाना था। कुछ नेताओं ने राजद के साथ गठबंधन पर भी असंतोष जताया, कहा कि गठबंधन से कांग्रेस की पोलराइजेशन बढ़ी और अन्य समुदाय नाराज हुए। कई ने गठबंधन तोड़ने की मांग तक की। लेकिन राहुल गांधी ने कहा कि जब दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे, तब भी कांग्रेस क्यों नहीं जीत पाई, यह मुद्दा भी स्पष्ट किया।

 

चुनाव में विपक्ष की रणनीतियों पर सवाल उठे हैं, लेकिन जनता ने 20 साल से लगातार सत्ता में आई नीतीश सरकार पर भरोसा जताकर उन्हें कठोर जनादेश दिया है। कांग्रेस के लिए यह परिणाम एक गंभीर चेतावनी और प्रतिबिम्ब है कि अब जमीन पर जाकर जनसमस्याओं पर ध्यान देना कितना जरूरी है।