बिहार में चुनाव खत्म होते ही
नेता लोग जैसे किसी अदृश्य “दिल की भड़ास खोलो मंच” पर पहुँच जाते हैं। जीतने
वाले खुद को जनता की नज़र में मसीहा साबित करने लगते हैं और हारने वाले अचानक ज्ञान
की गंगा बहाने लगते हैं। लेकिन इस बार जो बयान सामने आया, उसने बिहार की राजनीति की
सारी मर्यादाओं को न केवल लांघ दिया, बल्कि पूरी लाइन ही मिटा दी।
हम बात कर रहे हैं मुकेश सहनी
के उस विवादित बयान की—
“10,000 रुपये में बिहार की सरकार
मिल जाती है।”
यह बयान सामने आते ही चाय वाले
दुकानदार से लेकर खेतों में काम कर रहे किसान तक एक ही बात कहने लगे—
“इतना नीचे गिर सकता है कोई?”
क्या हार इंसान को इतना भी गिरा
देती है?
राजनीति में हार और जीत हमेशा
से चलती आई है। बड़े-बड़े दिग्गज नेता हारे हैं, और हार के बाद संयमित बयान भी दिए
हैं। किसी ने कहा—जनता बदलाव चाहती थी। किसी ने माना—विकास, जाति और स्थानीय मुद्दों
ने असर डाला। कोई बोला—रणनीति कमजोर थी, मेहनत कम पड़ गई।
लेकिन यह शायद पहला मौका है जब किसी नेता ने सीधे जनता पर उंगली उठा दी।
“10,000 में सरकार मिलती है”—
यह सिर्फ एक आरोप नहीं, बल्कि पूरे बिहार को बिकाऊ कह देने जैसा है। यह कहना
कि जनता अपना वोट पैसों में बेच देती है—न सिर्फ गलत है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का
अपमान भी है।
क्या कोई नेता अपने ही वोटरों
को इतना छोटा समझ सकता है?
अगर किसी नेता को जनता की समझ
पर भरोसा नहीं है, तो फिर राजनीति में आने का क्या औचित्य बचता है? यह बयान साफ दिखाता
है कि यह हताशा से उपजा हुआ ‘तर्क’ है, जिसमें न तथ्य है, न मर्यादा—बस आरोप हैं।
अन्य नेता भी बोले, लेकिन शालीनता
में बोले
यह भी सही है कि कई नेताओं ने
10,000 वाली आर्थिक सहायता योजना पर सवाल उठाए।
किसी ने कहा—योजना का समय गलत था।
किसी ने कहा—सरकार पर बोझ पड़ेगा।
किसी ने कहा—इससे वोटिंग पैटर्न प्रभावित हुआ।
जन सुराज के राष्ट्रीय अध्यक्ष
श्री उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह ने तो यह तक कह दिया—
“10,000 रुपये World Bank से कर्ज लेकर दिया गया है।”
अब यह कितना तथ्यात्मक है, यह
दस्तावेज तय करेंगे। पर कम से कम भाषा संयमित थी। आरोप योजना पर था, सरकार पर था—जनता
पर नहीं।
लेकिन मुकेश सहनी का बयान?
जैसे कह रहे हों—
“हम हारे नहीं, जनता बिक गई।”
यह तर्क नहीं, हार की हताशा का
परिणाम है।
आप से एक उल्टा सवाल — आपने जनता
के लिए किया क्या है?
सूत्र बताते हैं कि चुनाव से
पहले किसी नेता ने कहा था –
“हम 1 करोड़ खर्च करेंगे…”
फिर खबर आती है—टिकट ही नहीं मिला।
फिर कहते हैं—चुनाव में लाखों खर्च किए।
तो जब आप खर्च करें तो यह ‘जन
सेवा’ है,
और जब सरकार आमजन को 10,000 दे दे तो वह ‘भीख’ और वोट की खरीद - फरोख्त?
वाह, क्या सोच है!
यह बयान दर्शाता है कि कुछ नेताओं
ने चुनाव को सिर्फ जाति + पैसा = जीत का सीधा फॉर्मूला समझ रखा था।
लेकिन जैसे ही जनता ने उनके इस फॉर्मूले को ठुकराया, तर्क बदल गया—
“जनता बिक गई।”
असल समस्या जनता नहीं—सोच
का दिवालियापन है।
चुनाव में सब चलता है, पर मर्यादा
भी कोई चीज़ होती है
हम जानते हैं कि राजनीति में
‘साम, दाम, दंड, भेद’ सब चलता है। रणनीति, उत्साह, प्रचार, वादे—ये सब चुनावी प्रक्रिया
का हिस्सा हैं।
लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है।
आरोप नीति पर लगाना ठीक है।
विरोधियों पर सवाल उठाना भी राजनीति है।
लेकिन जनता को भ्रष्ट कहना—यह किसी नेता की भाषा नहीं हो सकती।
हार-जीत तो आती-जाती है,
लेकिन बयान, सोच और राजनीतिक संस्कार—यह बता देते हैं कि नेता असल में कितना परिपक्व
है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि मुकेश
सहनी के बयान में न परिपक्वता दिखी, न संवेदनशीलता, न ही लोकतांत्रिक मर्यादा।
बिहार की जनता बिकाऊ नहीं – आपकी
सोच जरूर सस्ती लगी
बिहार की जनता मेहनती, ईमानदार
और संघर्षशील है।
यहाँ के लोग 10,000 तो छोड़िए, 10 रुपये के लिए भी पूरा दिन मेहनत करते हैं।
वे बिकते नहीं—वे चुनते हैं।
आज का युवक यह जानता है कि—
कौन नेता सिर्फ जाति की दुकान खोलकर बैठा है,
कौन सिर्फ वोट बैंक की खेती करता है,
और कौन सिर्फ बयानबाज़ी से सुर्खियों में रहना चाहता है।
मुकेश सहनी का बयान साबित करता
है कि—
जनता नहीं, उनकी सोच बिक चुकी है।
यह बयान बिहार का अपमान है
जो नेता अपने वोटरों को ही नीचा
दिखाने लगे,
वो जनता के बीच रहने लायक कैसे हैं?
नेता का काम है—
जनता से सवाल पूछना,
जनता की समस्या सुनना,
उसे सम्मान देना।
लेकिन यहाँ तो उल्टा हो रहा है।
हार सामने दिखी, तो गुस्सा जनता पर निकल दिया।
जैसे कोई नेता अपनी नाकामी छिपाने के लिए पूरे बिहार को आरोपी बना रहा हो।
अंत में,
बिहार में राजनीति हमेशा जोशीली
रही है।
यहाँ बहसें होती हैं, आरोप लगते हैं, पलटवार होते हैं।
लेकिन इस बार जो हुआ, उसने राजनीति नहीं – समझदारी को भी शर्मिंदा कर दिया।
कहना पड़ेगा –
“10,000 में सरकार मिलती है”—
यह नहीं,
“10,000 में आपकी सोच बिक गई”—यह ज़्यादा सच है।
विश्लेषण
यह विवादित बयान एक राजनीतिक
प्रतिक्रिया भर नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा की स्पष्ट अवहेलना थी। जब कोई नेता
अपनी हार का कारण खुद की कमजोरियों में खोजने की बजाय जनता पर थोपने लगता है, तो यह
राजनीतिक परिपक्वता की कमी को दर्शाता है। बिहार की जनता हमेशा से जागरूक रही है और
मुद्दों के आधार पर वोट करती रही है। ऐसे में “10,000 में सरकार मिल जाती है” कहना
न सिर्फ झूठा है, बल्कि बिहार की मेहनतकश जनता का सीधा अपमान भी है। इस विवाद ने यह
भी स्पष्ट कर दिया कि कई नेता लोकतंत्र को जनता का सम्मान करने की जगह, उसे गाली देने
का माध्यम समझने लगे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल गलत है बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति के
लिए घातक भी है।
Video Link: https://youtu.be/9vedKo1LddI



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