कुछ साल पहले तक भारतीय राजनीति में एक अलग ही माहौल दिखाई देता था। सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक, चर्चा का बड़ा हिस्सा कांग्रेस सरकारों की कमियों, घोटालों और नीतियों पर केंद्रित रहता था। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के समर्थक उसकी उपलब्धियों और नेतृत्व की जमकर तारीफ करते थे।

लेकिन अब तस्वीर बदलती हुई दिखाई दे रही है।

 

आज सोशल मीडिया पर वही लोग भी सरकार की आलोचना करते दिखाई देते हैं, जो कभी बीजेपी के समर्थन में दूसरों से बहस करने के लिए तैयार रहते थे। सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या विपक्ष अपना राजनीतिक नैरेटिव स्थापित करने में सफल हो गया है? क्या सरकार की जनता पर पकड़ कमजोर हुई है? या फिर सोशल मीडिया ने राजनीति की पूरी दिशा ही बदल दी है?

 

सच यह है कि सोशल मीडिया आज राजनीतिक धारणा बनाने का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। जिस सोशल मीडिया को कभी बीजेपी के उभार का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना गया, उसी सोशल मीडिया पर आज सरकार के खिलाफ बड़ी मात्रा में सामग्री दिखाई देती है। दूसरी तरफ, मुख्यधारा के मीडिया का प्रभाव भी पहले जैसा एकतरफा नहीं रहा। अब एक मोबाइल फोन और कुछ मिनट के वीडियो के जरिए कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक पहुंच सकता है।

 

यहीं से शुरू होती है असली समस्या—आधी जानकारी, तेज निष्कर्ष और वायरल नैरेटिव।

 

1 लाख की कंपनी और 1000 करोड़ का ठेका!

हाल ही में बिहार से जुड़ी एक खबर तेजी से वायरल हुई। दावा किया गया कि बिहार सरकार ने करीब 1000 करोड़ रुपये का सरकारी ठेका एक ऐसी कंपनी को दे दिया, जिसकी संपत्ति महज 1 लाख रुपये है।

अब जाहिर है, ऐसा दावा सुनने के बाद लोगों के मन में सवाल उठेंगे ही। सोशल मीडिया पर फिर वही परिचित प्रतिक्रियाएं शुरू हो जाती हैं—घोटाला हुआ, भ्रष्टाचार हुआ, किसी ने पैसा खा लिया, सरकार ने अपने लोगों को फायदा पहुंचाया और न जाने क्या-क्या। लेकिन क्या किसी खबर को केवल उसके आकर्षक और उत्तेजक शीर्षक के आधार पर सच मान लेना उचित है?

 

यहीं पर हमें रुककर पूरी प्रक्रिया को समझने की जरूरत है। सरकारी ठेके आमतौर पर एक निर्धारित निविदा या टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से दिए जाते हैं। टेंडर में भाग लेने के लिए कंपनियों को कई शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। तकनीकी योग्यता, वित्तीय क्षमता, अनुभव, दस्तावेज और अन्य पात्रताओं की जांच की जाती है। इसलिए केवल किसी कंपनी के नाम के सामने दिखाई देने वाली शुरुआती पूंजी या संपत्ति की राशि देखकर यह निष्कर्ष निकाल देना कि उसे इतनी बड़ी परियोजना देने में घोटाला हुआ है, अपने आप में पर्याप्त प्रमाण नहीं है।

 

क्या छोटी संपत्ति वाली कंपनी के नाम पर बड़ा प्रोजेक्ट चल सकता है?

व्यापार और कॉर्पोरेट जगत में कई बार बड़ी कंपनियां किसी विशेष परियोजना के लिए अलग इकाई, सहायक कंपनी या स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) जैसी संरचना बनाती हैं।

मान लीजिए किसी बड़ी कंपनी को एक विशेष परियोजना मिलती है। उस परियोजना की लागत, खर्च, आय, प्रगति और लाभ-हानि का अलग-अलग हिसाब रखने के लिए एक अलग प्रोजेक्ट इकाई बनाई जा सकती है।

ऐसी नई इकाई की शुरुआत सीमित पूंजी से हो सकती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि पूरी परियोजना की क्षमता केवल उसी शुरुआती राशि तक सीमित है।

 

किसी परियोजना की वास्तविक वित्तीय क्षमता का आकलन करते समय यह देखना जरूरी होता है कि टेंडर किस संस्था को दिया गया, उसकी पात्रता क्या थी, उसके पीछे कौन-सी मूल या प्रमोटर कंपनी है, वित्तीय व्यवस्था कैसे की गई है और अनुबंध की शर्तें क्या हैं।

यानी केवल यह कहना कि “1 लाख की संपत्ति वाली कंपनी को 1000 करोड़ का ठेका मिल गया”, पूरी कहानी नहीं बताता।

और राजनीति में अक्सर यही होता है—एक अधूरी जानकारी को इस तरह पेश किया जाता है कि उससे पहले ही निष्कर्ष निकल जाए और जांच की जरूरत ही महसूस न हो।

 

सोशल मीडिया में नकारात्मक खबर तेजी से क्यों फैलती है?

क्योंकि नकारात्मक खबरें अक्सर ज्यादा क्लिक बटोरती हैं।

अगर किसी वीडियो का शीर्षक हो “सरकार ने नई परियोजना शुरू की”, तो शायद सीमित लोग क्लिक करें। लेकिन यदि शीर्षक हो “1000 करोड़ का बड़ा घोटाला! 1 लाख की कंपनी को मिला ठेका!”, तो स्वाभाविक रूप से लोगों की जिज्ञासा बढ़ जाएगी।

यहीं से क्लिक, व्यू और शेयर की राजनीति शुरू होती है।

 

समस्या तब पैदा होती है जब सनसनीखेज शीर्षक के पीछे मौजूद तथ्यों की जांच नहीं की जाती। कई लोग वीडियो देखते हैं, शीर्षक पढ़ते हैं और तुरंत अपनी राय बना लेते हैं। फिर वही राय आगे हजारों लोगों तक पहुंचती है और धीरे-धीरे एक धारणा स्थापित हो जाती है। कई बार बाद में तथ्य सामने भी आ जाएं, तब तक नुकसान हो चुका होता है।

 

राजनीति में नैरेटिव की लड़ाई

राजनीति केवल चुनावी मैदान में नहीं लड़ी जाती। आज लड़ाई सोशल मीडिया, वीडियो, पोस्ट, रील और व्हाट्सऐप संदेशों में भी लड़ी जा रही है।

केंद्र की राजनीति हो या बिहार की, हर सरकार के पक्ष और विपक्ष में नैरेटिव बनाए जाते हैं। 2014, 2019 और 2024 के चुनावों के दौरान भी अलग-अलग राजनीतिक दावे और भविष्यवाणियां सामने आती रहीं। किसी ने सरकार के टिकने पर सवाल उठाया, तो किसी ने नेतृत्व की क्षमता पर।

 

बिहार की राजनीति में भी सत्ता परिवर्तन और नेतृत्व परिवर्तन के साथ नए राजनीतिक समीकरण और नए नैरेटिव सामने आते हैं। किसी भी नई सरकार या नए नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रशासन चलाना नहीं होती, बल्कि जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना भी होती है।

 

लेकिन यह काम केवल सरकार का नहीं है। विपक्ष का अधिकार है कि वह सरकार से सवाल पूछे। मीडिया का अधिकार और जिम्मेदारी है कि वह जांच करे। जनता को भी हर फैसले पर सवाल पूछने का अधिकार है।

लेकिन सवाल और निष्कर्ष में अंतर होना चाहिए।

 

सवाल पूछना लोकतंत्र है, लेकिन बिना पूरी जानकारी के फैसला सुना देना भ्रम फैला सकता है। जिम्मेदारी सरकार की भी, विपक्ष की भी और हमारी भी।

 

आज जरूरत है कि किसी भी बड़े आरोप या सनसनीखेज दावे को शेयर करने से पहले उसकी मूल जानकारी देखी जाए। टेंडर के दस्तावेज क्या कहते हैं? अनुबंध किसके नाम पर है? कंपनी की संरचना क्या है? क्या कोई मूल कंपनी या समूह इसके पीछे है? क्या दावा केवल शुरुआती पूंजी को लेकर किया जा रहा है? इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

 

सरकारों को भी अधिक पारदर्शिता के साथ ऐसे मामलों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि अफवाहों और भ्रामक दावों के लिए जगह कम हो। विपक्ष को भी तथ्यों के आधार पर सवाल उठाने चाहिए और सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वालों को यह समझना होगा कि वायरल होने की दौड़ में गलत जानकारी फैलाना लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है।

 

अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। किसी भी विचार या खबर को केवल इसलिए सच नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि वह हमारी राजनीतिक सोच के अनुकूल है।

सरकार के खिलाफ सवाल उठाइए, विपक्ष से भी सवाल पूछिए, लेकिन सबसे पहले तथ्यों तक जाइए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज सिर्फ झूठ नहीं होती—कई बार आधा सच भी उतना ही खतरनाक होता है।

(लेखक GPNBihar के प्रधान संपादक हैं।)

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Video Link: https://youtu.be/sSkdJ88TLJA


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