भारतीय राजनीति में एक बेहद शर्मनाक लेकिन आम दृश्य अक्सर देखने को
मिलता है—जब भी राज्यसभा चुनाव हों या सरकार बनाने की नौबत आए, विधायकों
और सांसदों (MPs/MLAs) को आनन-फानन में हवाई जहाजों में भरकर किसी
गुप्त रिज़ॉर्ट या दूसरे राज्य में भेज दिया जाता है। हाल ही में मध्य प्रदेश से
कांग्रेस विधायकों को बेंगलुरु ले जाए जाने की खबरें इसी 'रिज़ॉर्ट
पॉलिटिक्स' का ताजा उदाहरण हैं।
आरोप हमेशा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर लगता है कि वह विरोधी
दलों के नेताओं की 'खरीद-फरोख्त' करती है। लेकिन यहाँ सवाल सिर्फ खरीदने वाले पर
नहीं, बल्कि बिकने को तैयार बैठे नेताओं और उन्हें टिकट देने वाली
पार्टियों की नीयत पर भी उठता है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस सहित कई
विपक्षी दलों को आखिर अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों पर इतना अविश्वास क्यों है?
पार्टी निष्ठा और वैचारिक शून्यता
राजनीति में वैचारिक मतभेद या पाला बदलना नई बात नहीं है, लेकिन
आज की राजनीति में यह वैचारिक बदलाव नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से 'व्यापार' बन
चुका है। जब किसी पार्टी को डर होता है कि उसके नेता चंद प्रलोभनों या दबाव में
आकर टूट जाएंगे, तो यह सीधे तौर पर उस पार्टी के सांगठनिक ढांचे और नेतृत्व की कमजोरी
को दर्शाता है।
यदि आपके नेता सच्चे देशभक्त,
जनसेवक और पार्टी की विचारधारा के
प्रति वफादार हैं, तो उन्हें दुनिया की कोई भी ताकत या धनबल नहीं डिगा सकता। लेकिन जब
नेताओं का एकमात्र लक्ष्य सत्ता और पैसा बन जाए, तो वे पहली ही बोली में बिकने को तैयार
हो जाते हैं।
बिकाऊ नेताओं को टिकट क्यों?
जनता का यह सवाल पूरी तरह जायज है: अगर
किसी नेता के बिकने की इतनी ही संभावना है, तो पार्टियाँ उन्हें चुनाव में खड़ा ही
क्यों करती हैं?
इसके पीछे 'जीतने की क्षमता' (Winnability) का
वो कथित फॉर्मूला है, जिसने भारतीय लोकतंत्र को खोखला कर दिया है।
पार्टियाँ अक्सर चरित्र, ईमानदारी और जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर
उन रसूखदार, बाहुबली या धनवान उम्मीदवारों को टिकट देती हैं जो चुनाव जीत सकें।
जब टिकट का आधार ही केवल पैसा और सत्ता हो,
तो चुनाव जीतने के बाद वही नेता ज्यादा
ऊंचे दाम देने वाले के पाले में जाने से गुरेज नहीं करता। ऐसे नेताओं को अपनी 'गोद
में बिठाकर' रखना और फिर उनके बिकने का रोना रोना, पार्टियों का पाखंड है।
जनता की गाढ़ी कमाई और भारी-भरकम खर्च
इन नेताओं को चार्टर्ड प्लेन से ले जाने, महंगे
फाइव-स्टार रिज़ॉर्ट्स में रखने, उनके खान-पान और सुरक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च
किए जाते हैं।
- सवाल
यह है कि इस शाही खर्च का पैसा कहाँ से आता है? यह पैसा सीधे या परोक्ष रूप से जनता की
गाढ़ी कमाई या कॉर्पोरेट फंडिंग का हिस्सा होता है।
- जो पैसा
विकास कार्यों, गरीबों के कल्याण, शिक्षा
और स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च होना चाहिए, वह नेताओं को 'संभालकर
रखने' में बर्बाद हो जाता है।
- अगर यही
पैसा पार्टियों द्वारा अपने-अपने क्षेत्रों के गरीब लोगों के उत्थान के लिए
लगाया जाए, तो जनता को भी लाभ होगा और पार्टियों को
ऐसे वफादार जमीनी कार्यकर्ता मिलेंगे जिन्हें किसी रिज़ॉर्ट में छुपाने की
जरूरत नहीं पड़ेगी।
लोकतंत्र और मतदाता का अपमान
यह पूरी प्रक्रिया उस आम नागरिक का सबसे बड़ा अपमान है, जो
धूप-गर्मी में लाइन में लगकर इस उम्मीद के साथ वोट देता है कि उसका प्रतिनिधि
क्षेत्र का विकास करेगा। जब चुना हुआ प्रतिनिधि चंद दिनों बाद अपनी पार्टी और
मतदाताओं के भरोसे को बेच देता है, तो लोकतंत्र महज एक तमाशा बनकर रह जाता है। 'रिज़ॉर्ट
पॉलिटिक्स' मतदाताओं के विवेक और उनके जनादेश का सरेआम मजाक उड़ाती है।
विश्लेषण:
भारतीय राजनीति में 'रिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स' का
बार-बार दोहराया जाना यह साबित करता है कि अब विचारधारा की राजनीति पूरी तरह
समाप्त हो चुकी है और इसकी जगह 'अवसरवाद'
ने ले ली है। आरोप-प्रत्यारोप के इस
दौर में मुख्य दोष केवल खरीदने वाली पार्टी (बीजेपी) पर मढ़ दिया जाता है, लेकिन
यह विपक्षी दलों—विशेषकर कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी—की आंतरिक कमजोरी और
सांगठनिक विफलता को भी उजागर करता है। अपने ही चुने हुए विधायकों पर अविश्वास करना
और उन्हें चार्टर्ड प्लेनों से सुरक्षित ठिकानों पर डंप करना यह दर्शाता है कि
टिकट वितरण का पैमाना 'निष्ठा'
नहीं, बल्कि केवल 'पैसा
और बाहुबल' था।
जब पार्टियाँ जमीनी और ईमानदार कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अवसरवादी
चेहरों को चुनती हैं, तो वे खुद ही इस खतरे को आमंत्रण देती हैं। इस
पूरे तमाशे में सबसे बड़ा नुकसान आम जनता और लोकतंत्र का होता है। जनता के टैक्स
और पार्टी फंड का करोड़ों रुपया नेताओं की खातिरदारी और उन्हें बिकने से बचाने में
बर्बाद होता है, जिसे वास्तव में जन-कल्याण में लगना चाहिए था। निष्कर्षतः, जब
तक राजनीतिक दल 'जीतने की क्षमता'
(Winnability) के शॉर्टकट को छोड़कर वैचारिक रूप से
मजबूत और वफादार नेतृत्व तैयार नहीं करेंगे,
तब तक भारतीय लोकतंत्र इसी तरह
रिज़ॉर्ट्स और गुप्त ठिकानों में बंधक बनता रहेगा। यह मतदाता के जनादेश के साथ एक
क्रूर मजाक है।
- (डॉ. गौतम पाण्डेय का विश्लेषण)
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