आज जो मुद्दा मैं उठा रहा हूँ, यह सिर्फ मेरी या किसी एक व्यक्ति की आवाज़ नहीं है, बल्कि देश के हर उस गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार की दास्तान है जो रोज महंगाई की भट्टी में झुलस रहा है। मैं जो धरातल पर देख रहा हूँ, जो महसूस कर रहा हूँ, वही आप तक पहुँचाने की कोशिश है। आप खुद पढ़िए और सोचिए कि क्या यह समस्या आपकी और हमारी नहीं है?

 

कॉर्पोरेट और सरकार का 'क्रोनोलोजी' मॉडल!

कई बार विपक्ष के उस आरोप में दम नजर आने लगता है जिसमें वे केंद्र सरकार और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के बीच एक अदृश्य गठजोड़ की बात करते हैं। रिलायंस जियो (JIO) का उदाहरण हमारे सामने है। याद कीजिए, जब जियो लॉन्च हुआ तो लगभग दो सालों तक सब कुछ 'मुफ्त' था। लोगों को हाई-स्पीड डेटा की ऐसी लत लगी कि सबने अपने पुराने नेटवर्क छोड़कर जियो पर पोर्ट करना शुरू कर दिया। जब पूरा बाजार मुट्ठी में आ गया, तब खेल बदला—धीरे-धीरे रेट बढ़ते गए और मुफ्त की सेवाएँ गायब हो गईं।

ठीक यही मॉडल आज हमारी सरकार भी अपनाती दिख रही है। पहले कहा गया कि दिल्ली-NCR समेत कई इलाकों में डीजल गाड़ियाँ प्रदूषण फैलाती हैं, इसलिए सीएनजी (CNG) अपनाओ। ऑटो, टैक्सी और आम लोगों ने कर्ज लेकर गाड़ियाँ सीएनजी पर शिफ्ट कीं। शुरुआत में सीएनजी सस्ती थी, तो दो पैसे की कमाई भी हो जाती थी। लेकिन आज? सीएनजी के दाम बढ़ते-बढ़ते डीजल-पेट्रोल के बराबर पहुँच चुके हैं। मिडिल क्लास और ऑटो वालों की कमाई ख़त्म!

अब नया नारा है—"डीजल, पेट्रोल, सीएनजी छोड़ो, ईवी (इलेक्ट्रिक व्हीकल) लाओ, इसमें खर्च कम है।" लेकिन यकीन मानिए, जिस दिन देश की बड़ी आबादी ईवी पर शिफ्ट हो गई, उस दिन बिजली के दाम आसमान छूने लगेंगे। खबरें तो अभी से आ रही हैं कि सरकार बिजली की दरें बढ़ाने की तैयारी में है।

 

'घाटा' नहीं, 'फायदा कम होने' की चिंता

अभी कल ही पेट्रोल के दाम में फिर 2 रुपये से अधिक की बढ़ोतरी हो गई। एक समाचार पत्र में मैंने पढ़ा कि वित्त मंत्री जी का कहना है कि टैक्स कम नहीं किया जाएगा, क्योंकि टैक्स कम करने से सरकार को 1 लाख करोड़ रुपये का घाटा होगा। यानी सरकार को अपनी तिजोरी के फायदे की चिंता है, लेकिन इस बात से वह पूरी तरह अनजान बनी बैठी है कि ईंधन का दाम बढ़ने से नमक से लेकर हवाई जहाज तक सब कुछ महंगा हो जाता है। जब परचून बाजार में अनाज, दाल, सब्जी, फल सब महंगे हो रहे हैं, तो आम आदमी खाएगा क्या और बचाएगा क्या?

जब भी सवाल पूछो, तो 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' और अंतरराष्ट्रीय बाजार का बहाना बना दिया जाता है कि कच्चे तेल की खरीद महंगी हो गई है। चलिए, मान लेते हैं। लेकिन यही मजबूरी बंगाल या अन्य राज्यों के चुनावों के वक्त क्यों गायब हो जाती है? तब दाम क्यों नहीं बढ़ते? और याद कीजिए, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम इतिहास के सबसे निचले स्तर (लगभग $37 प्रति बैरल) पर आ गए थे, तब आपने देश में पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं किया? तब तो दाम वहीं के वहीं रहे। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार की यह दलील पूरी तरह बेमानी लगती है।

 

80 करोड़ को मुफ्त अनाज: राहत या किसानों के लिए आफत?

सरकार अक्सर पीठ थपथपाती है कि हम 80 करोड़ जनता को मुफ्त राशन दे रहे हैं। बेशक, गरीबों की मदद होनी चाहिए, लेकिन क्या सरकार को पता है कि इस नीति की वजह से आज देश का अन्नदाता यानी किसान बर्बादी की कगार पर है?

मुफ्त अनाज पाने वाले वर्ग में एक बहुत बड़ी आबादी ग्रामीण मजदूरों की है। अब स्थिति यह है कि उन्हें पेट भरने के लिए अनाज मुफ्त मिल ही जाता है, बच्चों की पढ़ाई या बचत की उन्हें कोई फिक्र नहीं है। नतीजा यह हुआ कि वे खेतों में मजदूरी करने नहीं जा रहे हैं। आज फसलें कटने के लिए तैयार खड़ी हैं, लेकिन खेतों में काम करने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे।

ऊपर से मौसम की मार अलग है। पिछले दिनों आए आंधी-तूफान ने मक्के की फसल को पूरी तरह जमीन पर सुला दिया। लगातार हो रही बारिश से खेतों में पानी भरा है और मक्का सड़ रहा है। लेकिन कोई मजदूर उस गिरे हुए मक्के को उठाने के लिए तैयार नहीं है। जैसे समाज में गिरे हुए इंसान को कोई नहीं उठाता, वैसे ही इस गिरे हुए मक्के को उठाने वाला कोई नहीं है। मजदूर भूखा हो तब तो मेहनत करे, उसे जब मुफ्त का खाना मिल ही रहा है, तो वह पानी में घुसकर मेहनत क्यों करेगा?

नतीजा यह होता है कि पानी में डूबा हुआ अनाज औने-पौने दाम पर बिकता है। किसान की लागत तक वसूल नहीं हो पाती।

 

भ्रष्टाचार का 'चक्रवृद्धि' जाल

लागत न निकलने पर किसान स्थानीय साहूकारों से सूद (ब्याज) पर पैसा लेता है। वह ब्याज चक्रवृद्धि (Compound Interest) होकर मूलधन से दो से तीन गुना हो जाता है।

आप कहेंगे कि फसल का बीमा क्यों नहीं करवाते? तो हुजूर, फसल का बीमा तभी होता है जब आप बैंक से लोन लेंगे। और बैंक से लोन लेने की क्या प्रक्रिया है, यह सरकार से छिपी नहीं है। बिना 'चढ़ावा' (रिश्वत) दिए बैंक में कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती। रिश्वत पहले ली जाती है, लोन बाद में पास होता है। भ्रष्टाचार चरम पर है!

एक तरफ खाद और बीज के दाम आसमान छू रहे हैं, दूसरी तरफ खुदरा विक्रेता तय कीमत से अधिक वसूल रहे हैं। बिचौलिए मोटे होते जा रहे हैं और किसान के शरीर से मांस घटता जा रहा है। विडम्बना देखिए—जो पूरे देश का पेट भरता है, उसे खुद 3 वक्त का पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण खाना नसीब नहीं हो रहा है।

 

क्या ऐसे बनेगा 'विश्वगुरु'?

भारत संयुक्त राष्ट्र (UN) में स्थायी सदस्यता का दावा ठोकता है। लेकिन क्या जिस देश की 80 करोड़ आबादी सरकार के 5 किलो मुफ्त अनाज के भरोसे जी रही हो, उसे दुनिया महाशक्ति मानेगी? कभी नहीं।

मैं मानता हूँ कि सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के दावे करती है, योजनाएँ भी लाती है। पर क्या कोई ऐसा तंत्र (System) है जो यह जांच सके कि यह मदद बिना रिश्वत के आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति तक पहुँच रही है? वृद्धा पेंशन हो या राशन कार्ड बनवाना हो, हर जगह पहले टेबल के नीचे से चढ़ावा देना पड़ता है।

 

जनता को सब्जबाग नहीं, जमीन पर काम चाहिए!

सरकार को अब गंभीरता से सोचना पड़ेगा, अन्यथा 2029 की राह बहुत भारी पड़ने वाली है। देश के दो-तिहाई से अधिक राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, लेकिन जनता को कोई जमीनी राहत नहीं मिल रही है। लोग अब ऊँची इमारतें और चौड़ी सड़कें देखकर थक चुके हैं। जनता को क्या चाहिए?

  • सम्मानजनक रोजगार
  • साफ-सुथरी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
  • बिना पेपर लीक के पारदर्शी परीक्षाएँ

इन बुनियादी मोर्चों पर सरकार अब तक नाकाम रही है। आम आदमी परेशान है, बेबस है। वह किससे शिकायत करे? जहाँ भी जाओ, एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है— "अब रोने का समय खत्म हुआ, अब मुस्कुराइए।" लेकिन हुजूर, खाली पेट और खाली जेब के साथ कोई कैसे मुस्कुराए?

Video Link: https://youtu.be/edxtlXLmz6g

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