पटना/ पूर्णिया: बिहार की राजनीति में एक बार फिर बांकीपुर विधानसभा सीट चर्चा के केंद्र में है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नबीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने से यह सीट रिक्त हो गई है। अब यहां होने वाला उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा और जन सुराज के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बनता जा रहा है। खास बात यह है कि जन सुराज ने संकेत दिया है कि पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर स्वयं इस सीट से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह मुकाबला बिहार की राजनीति का सबसे चर्चित उपचुनाव बन जाएगा।

 

नितिन नबीन का अभेद्य किला

बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती है। इस सीट पर नितिन नबीन का राजनीतिक प्रभाव निर्विवाद रहा है। वे छह बार विधायक चुने जा चुके हैं और वर्ष 2010 से लेकर 2025 तक लगातार पांच विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज कर चुके हैं। इससे पहले वे 2006 के उपचुनाव में पटना साहिब से भी विधायक बने थे।

2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नबीन ने 98,299 मत प्राप्त कर राष्ट्रीय जनता दल की प्रत्याशी रेखा कुमारी को 51,936 वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया था। वहीं जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को केवल 7,717 वोट मिले थे। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि बांकीपुर में भाजपा की पकड़ कितनी मजबूत रही है।

अब नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह उपचुनाव उनके राजनीतिक प्रभाव की भी परीक्षा माना जाएगा। यदि भाजपा इस सीट को बरकरार रखती है तो यह संदेश जाएगा कि नितिन नबीन का जनाधार उनके व्यक्तिगत चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन भी उसी मजबूती से खड़ा है।

 

प्रशांत किशोर के लिए पहली बड़ी अग्निपरीक्षा

दूसरी ओर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2022 में जन सुराज अभियान शुरू करने के बाद उन्होंने पूरे बिहार में लंबी पदयात्रा की और स्वयं को पारंपरिक राजनीति के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। पार्टी का दावा रहा कि चुनाव तक उसके साथ डेढ़ करोड़ से अधिक सदस्य जुड़े।

हालांकि 2025 के विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर स्वयं चुनाव नहीं लड़े। जन सुराज को पूरे बिहार में लगभग 16 लाख वोट अवश्य मिले, लेकिन अधिकांश उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। ऐसे में आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या जन सुराज का वोट प्रतिशत संगठनात्मक ताकत में बदल पाया है।

अब यदि प्रशांत किशोर स्वयं बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो यह उनके राजनीतिक जीवन का पहला प्रत्यक्ष चुनाव होगा। अब तक वे चुनावी रणनीतिकार और किंगमेकर के रूप में पहचाने जाते रहे हैं, लेकिन पहली बार जनता से सीधे जनादेश मांगते दिखाई देंगे।

 

यदि प्रशांत किशोर जीतते हैं...

यदि उपचुनाव में प्रशांत किशोर जीत दर्ज करते हैं तो इसका असर केवल बांकीपुर तक सीमित नहीं रहेगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद उनके गृह क्षेत्र में पार्टी की हार को विपक्ष बड़ा राजनीतिक संदेश बताएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में ऐसी स्थिति नितिन नबीन के संगठनात्मक नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर सकती है। भाजपा के लिए यह केवल एक सीट की हार नहीं होगी, बल्कि यह विपक्ष को यह कहने का अवसर देगी कि नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी उनका सबसे मजबूत गढ़ सुरक्षित नहीं रह सका।

इसके साथ ही प्रशांत किशोर की जीत जन सुराज को बिहार में एक गंभीर राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित कर सकती है। इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और भविष्य के चुनावों में संगठन को नई ऊर्जा मिलेगी।

 

यदि भाजपा सीट बचा लेती है...

दूसरी ओर यदि भाजपा यह सीट सुरक्षित रखने में सफल रहती है और प्रशांत किशोर स्वयं चुनाव हार जाते हैं तो इसका प्रभाव जन सुराज की राजनीति पर गहरा पड़ सकता है।

पिछले चार वर्षों से प्रशांत किशोर बिहार में व्यवस्था परिवर्तन, नई राजनीति और वैकल्पिक नेतृत्व की बात कर रहे हैं। यदि वे स्वयं जनता का विश्वास हासिल नहीं कर पाते, विशेषकर उस सीट पर जिसे उन्होंने अपनी पहली राजनीतिक परीक्षा के लिए चुना, तो उनके पूरे राजनीतिक नैरेटिव पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

विपक्षी दल यह प्रचार करेंगे कि प्रशांत किशोर एक सफल चुनावी रणनीतिकार तो हो सकते हैं, लेकिन जननेता बनने की उनकी कोशिश सफल नहीं हुई। इससे जन सुराज के कार्यकर्ताओं का उत्साह भी प्रभावित हो सकता है और संगठन के विस्तार की गति धीमी पड़ सकती है।

 

चुनाव से आगे की लड़ाई

यह उपचुनाव केवल भाजपा और जन सुराज के बीच नहीं होगा, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक मॉडलों की भी परीक्षा होगी। एक ओर भाजपा का मजबूत संगठन, स्थापित वोट बैंक और वर्षों का राजनीतिक अनुभव है, तो दूसरी ओर प्रशांत किशोर का बदलाव का एजेंडा और नई राजनीति का दावा।

चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो, उसका असर आगामी बिहार विधानसभा चुनावों की रणनीति पर अवश्य दिखाई देगा। यदि जन सुराज अच्छा प्रदर्शन करती है तो बिहार की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबले की संभावनाएं और मजबूत होंगी। वहीं भाजपा की जीत यह साबित करेगी कि उसके पारंपरिक गढ़ अभी भी सुरक्षित हैं।

 

निष्कर्ष

बांकीपुर उपचुनाव अब सामान्य चुनाव नहीं रह गया है। यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की राजनीतिक प्रतिष्ठा और प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य—दोनों की परीक्षा बन चुका है। एक ओर भाजपा के सामने अपना अभेद्य किला बचाने की चुनौती है, तो दूसरी ओर प्रशांत किशोर के सामने अपने राजनीतिक दावों को जनादेश में बदलने की कसौटी।

यही कारण है कि पूरे बिहार की नजर अब बांकीपुर पर टिक गई है। आने वाला परिणाम केवल एक विधायक का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि बिहार की राजनीति में आने वाले वर्षों का विमर्श किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

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Video Link: https://youtu.be/d7Tli4L1l_g

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