डॉ. गौतम पाण्डेय का विश्लेषण

कुछ दिन पहले की बात है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर एक आपसी चर्चा में मैंने कहा था कि संभव है, इस बार प्रशांत किशोर चुनाव जीत जाएँ। उस समय यह बात शायद थोड़ी असंभव लगती थी। आखिर बांकीपुर कोई सामान्य विधानसभा सीट नहीं थी। यह लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ रही है और 1995 से लगातार बीजेपी इस क्षेत्र में जीतती रही है।

लेकिन आज जब परिणाम हमारे सामने है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रशांत किशोर कैसे जीत गए? असली सवाल यह है कि बीजेपी बांकीपुर जैसे अपने मजबूत गढ़ में आखिर हार कैसे गई?

 

मेरी नजर में इस चुनाव को केवल प्रशांत किशोर की लोकप्रियता से समझना अधूरा होगा।

यह सच है कि प्रशांत किशोर पढ़े-लिखे हैं, विदेश में काम कर चुके हैं और पिछले कई वर्षों से बिहार की गलियों में घूमकर लोगों से संवाद करते रहे हैं। उन्होंने गांव-गांव जाकर बिहार के लोगों के दुःख-दर्द को समझने का दावा किया और जन सुराज के माध्यम से एक वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने की कोशिश की। जन सुराज के पास यह कहने का आधार भी था कि पढ़ा-लिखा और जमीन पर काम करने वाला चेहरा बांकीपुर के मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है।

 

लेकिन सवाल हैबांकीपुर ही क्यों?

जिस सीट पर बीजेपी का दशकों से प्रभाव रहा हो, जहां उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार चुनाव जीतते रहे हों, वहां अचानक जन सुराज की जीत केवल एक व्यक्ति की लोकप्रियता का परिणाम मान लेना शायद बहुत आसान निष्कर्ष होगा।

 

भरत तिवारी की घटनाक्या यही सबसे बड़ा कारण था?

बांकीपुर चुनाव की चर्चा में भरत तिवारी की हत्या को भी एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया। निश्चित रूप से यह एक गंभीर और दुखद घटना थी और जनता में उसका आक्रोश रहा हो, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन क्या बांकीपुर के चुनाव परिणाम को पूरी तरह इसी घटना से जोड़ देना उचित होगा?

मेरी समझ से नहीं।

भरत तिवारी शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से संबंधित थे, जबकि चुनाव बांकीपुर में हुआ। दोनों क्षेत्रों के बीच कई विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इसलिए इस घटना का बांकीपुर के मतदाताओं पर सीधा और निर्णायक प्रभाव पड़ा, ऐसा मानने के लिए अभी पर्याप्त आधार नहीं दिखाई देता।

 

असली मुद्दा शायदछात्र आंदोलनथा

मेरी नजर में बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण छात्र आंदोलन और उससे पैदा हुआ सरकार-विरोधी माहौल हो सकता है।

शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े सवालों ने बिहार के युवाओं में गहरी नाराजगी पैदा की। जब किसी राज्य में बड़ी संख्या में छात्र और युवा सरकार से नाराज होते हैं, तो उसका राजनीतिक असर केवल एक मुद्दे तक सीमित नहीं रहता। वह धीरे-धीरे सरकार की पूरी छवि को प्रभावित करता है।

 

यही वह जगह है जहां सरकार से चूक हुई।

यदि पेपर लीक और छात्रों से जुड़े मुद्दों को शुरुआत में ही गंभीरता से सुलझा लिया गया होता, तो शायद मामला इतना बड़ा नहीं बनता। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी पहले हो सकता था। देर से उठाया गया कदम अक्सर समाधान से ज्यादा राजनीतिक नुकसान करता है।

 

UGC विवाद भी बना एक संभावित कारण

बांकीपुर के परिणाम को समझते समय UGC विवाद को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस मुद्दे को लेकर अगड़ी जातियों के एक वर्ग में नाराजगी की बात सामने आई है। खासकर ब्राह्मण और भूमिहार जैसे परंपरागत रूप से बीजेपी के मजबूत सामाजिक आधार माने जाने वाले वर्गों में इस मुद्दे को लेकर असहजता पैदा हुई।

हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि UGC विवाद के कारण ही बांकीपुर में बीजेपी का वोट कम हुआ। इसके ठोस प्रमाण के लिए बूथवार मतदान और जातीय मतदान के आंकड़ों की जरूरत होगी। लेकिन चुनावी राजनीति में किसी मुद्दे का असर हमेशा सीधे और स्पष्ट रूप में दिखाई नहीं देता। कई बार अलग-अलग छोटी-बड़ी नाराजगियां मिलकर एक बड़े असंतोष का रूप ले लेती हैं।

 

बिहार के भोजपुर और आसपास के इलाकों में ब्राह्मण और भूमिहार समुदाय का राजनीतिक प्रभाव रहा है। शाहपुर जैसे क्षेत्रों को भी इन समुदायों के मजबूत प्रभाव वाले इलाकों में गिना जाता है। हालांकि शाहपुर और बांकीपुर अलग विधानसभा क्षेत्र हैं, इसलिए दोनों के सामाजिक समीकरणों को सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा। फिर भी, UGC विवाद ने अगर व्यापक रूप से अगड़ी जातियों के एक वर्ग में नाराजगी पैदा की है, तो उसका राजनीतिक असर बांकीपुर जैसे शहरी क्षेत्र में भी कुछ हद तक पड़ा हो सकता है।

 

इस तरह देखें तो बीजेपी के सामने एक साथ कई मोर्चे बन गएपेपर लीक से युवाओं की नाराजगी, UGC विवाद से अगड़ी जातियों के एक हिस्से की असहजता और पहले से मौजूद सरकार-विरोधी माहौल। इन सबका मिला-जुला असर बीजेपी के परंपरागत वोट पर पड़ा हो, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

उम्मीदवार बदलनासवाल तो उठेंगे ही

बांकीपुर में बीजेपी ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हाबंटीको उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद में उन्हें हटाकर नीरज सिन्हा को मैदान में उतारा गया। यह बदलाव नामांकन की प्रक्रिया के दौरान ही हुआ।

 

यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता हैआखिर ऐसा क्यों हुआ?

सार्वजनिक रूप से इसके अलग-अलग कारण बताए गए, लेकिन राजनीति में timing भी बहुत कुछ कहती है।

क्या बीजेपी ने उम्मीदवार बदलकर चुनावी जोखिम बढ़ा दिया? क्या पार्टी को लगा कि सीट किसी भी हालत में बचाना मुश्किल है? या फिर इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति थी? यहां एक संभावना पर विचार किया जा सकता है।

 

मान लीजिए बीजेपी को अंदाजा था कि बांकीपुर में सरकार-विरोधी भावना इतनी मजबूत है कि चुनाव जीतना कठिन होगा। ऐसी स्थिति में एक सीट हारने से सरकार की स्थिरता पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन यदि उसी चुनाव में प्रशांत किशोर जीत जाते हैं, तो बीजेपी के पास एक मजबूत राजनीतिक तर्क भी पैदा हो सकता है।

विपक्ष लगातार वोट चोरी जैसे आरोप लगाता रहा है। ऐसे में बीजेपी यह कह सकती है कि अगर चुनावी प्रक्रिया में इतनी बड़ी गड़बड़ी होती, तो उसके सबसे मजबूत गढ़ों में से एक बांकीपुर में वह कैसे हारती?

 

यह एक राजनीतिक परिकल्पना है, प्रमाणित तथ्य नहीं। लेकिन राजनीति में रणनीतिक हार और रणनीतिक लाभ की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।

 

क्या प्रशांत किशोर को मजबूरी में वोट मिला?

बांकीपुर के परिणाम को समझने का एक और पहलू हैविकल्प की राजनीति।

संभव है कि बांकीपुर के एक वर्ग ने प्रशांत किशोर को इसलिए नहीं चुना हो कि वह जन सुराज की विचारधारा से पूरी तरह सहमत था, बल्कि इसलिए चुना हो क्योंकि वह बीजेपी को हराने के लिए उपलब्ध सबसे प्रभावी विकल्प दिखाई दिए।

कांग्रेस का प्रभावी मुकाबला नहीं था और आरजेडी के प्रति भी बांकीपुर के एक बड़े वर्ग में स्वाभाविक आकर्षण नहीं रहा होगा। ऐसे में बीजेपी विरोधी वोट का एक हिस्सा जन सुराज की तरफ चला गया होयह चुनावी गणित का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

इसलिए मेरी नजर में इस परिणाम का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य यही है

प्रशांत किशोर जीते नहीं हैं, बीजेपी हारी है; और बीजेपी की हार ने प्रशांत किशोर को जिताया है।

 

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि प्रशांत किशोर की जीत का कोई महत्व नहीं है।

बल्कि इसके ठीक विपरीत।

उन्होंने लंबे समय बाद यह साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में उनकी प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। 2025 के चुनावी प्रदर्शन के बाद बहुत से लोगों ने उन्हें लगभग समाप्त राजनीतिक शक्ति मान लिया था। लेकिन बांकीपुर ने तस्वीर बदल दी है।

जिस व्यक्ति ने एक मजबूत राजनीतिक गढ़ में सेंध लगाई हो, वह अब बिहार की राजनीति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

 

बीजेपी के लिए बांकीपुर का संदेश

बीजेपी को इस हार को सिर्फ एक उपचुनाव की हार मानकर भूलना नहीं चाहिए।

उपचुनाव में सरकार गिरती नहीं है, विधानसभा का गणित नहीं बदलता। लेकिन उपचुनाव अक्सर जनता के मूड का संकेत जरूर देते हैं।

अगर युवाओं की नाराजगी, पेपर लीक, रोजगार, शिक्षा और सरकार-विरोधी भावना को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले चुनावों में नुकसान बढ़ सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्ष ने वोट से जुड़े सवालों को जोर-शोर से उठाया था। बीजेपी ने उस समय उन आरोपों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। अब अगर वही सवाल अलग-अलग मुद्दों के साथ जनता के बीच फिर मजबूत होते हैं, तो इसे नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।

बांकीपुर इसलिए सिर्फ प्रशांत किशोर की जीत की कहानी नहीं है। यह बीजेपी के लिए एक चेतावनी भी है। और प्रशांत किशोर के लिए एक परीक्षा भी।

क्योंकि अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ बीजेपी के खिलाफ बने असंतोष के सहारे नहीं जीते, बल्कि बांकीपुर के लोगों ने उन्हें सचमुच एक बेहतर राजनीतिक विकल्प के रूप में चुना है।

बांकीपुर ने प्रशांत किशोर को विधानसभा में पहुंचा दिया है। अब असली परीक्षा विधानसभा के भीतर शुरू होगी।

 

विश्लेषण

बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत है। इसे केवल प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत लोकप्रियता या केवल बीजेपी विरोधी लहर का परिणाम मानना दोनों ही अधूरे निष्कर्ष होंगे। बीजेपी का लंबे समय से मजबूत गढ़ रहा बांकीपुर इस बार उसके हाथ से निकल गया और उम्मीदवार बदलने के फैसले ने भी सवाल खड़े किए।

मेरी नजर में छात्र आंदोलन, शिक्षा और पेपर लीक से पैदा नाराजगी, सरकार-विरोधी माहौल तथा बीजेपी के खिलाफ उपलब्ध सीमित विकल्पों ने मिलकर परिणाम बनाया। प्रशांत किशोर को इस असंतोष का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ मिला।

हालांकि यह कहना कि बीजेपी ने जानबूझकर चुनाव हारने की रणनीति बनाई थी, फिलहाल केवल एक राजनीतिक परिकल्पना है, तथ्य नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि बांकीपुर ने बीजेपी को चेतावनी और प्रशांत किशोर को नया राजनीतिक अवसर दिया है।

अब प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी चुनौती जीत को शासन और प्रदर्शन में बदलना होगी।

(डॉ. गौतम पाण्डेय GPNBihar Digital News Media के प्रधान संपादक हैं।)

Video Link: https://youtu.be/jAKzF3LeEco

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