नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने फैसला किया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस ने इस फैसले के समर्थन में अपने करीब नौ दशक पुराने, वर्ष 1937 के प्रस्ताव का हवाला दिया है।

 

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा है। इसे बंकिम चंद्र ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया था। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को कहा था कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ समान सम्मान दिया जाएगा।

 

कांग्रेस के नए फैसले के बाद बीजेपी ने पार्टी पर तीखा हमला बोला है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले को लेकर सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे देशविरोधी बताया और आरोप लगाया कि कांग्रेस एक बार फिर तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है।

 

अमित शाह ने दावा किया कि वर्ष 1937 में कांग्रेस द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो अंतरों को अपनाने के फैसले ने आगे चलकर दो-राष्ट्र सिद्धांत और देश के विभाजन को बल दिया। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष में मोदी सरकार ने इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का प्रयास किया है।

 

बीजेपी अध्यक्ष रह चुके जेपी नड्डा ने भी कांग्रेस पर राष्ट्रीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना के साथ समझौता करने का आरोप लगाया। बीजेपी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस का फैसला राष्ट्रीय गीत को लेकर दोहरे रवैये को दर्शाता है।

 

वहीं कांग्रेस ने बीजेपी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी कोई नया फैसला नहीं कर रही, बल्कि वर्ष 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा लिए गए निर्णय का ही पालन कर रही है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि पार्टी दशकों से ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे गाती रही है और इसे लेकर अब राजनीतिक विवाद खड़ा किया जा रहा है।

 

कांग्रेस का तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरों में भारत की प्राकृतिक सुंदरता, उर्वरता, जल, हरियाली और मातृभूमि की महिमा का वर्णन है। पार्टी ने महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के विचारों का भी हवाला दिया है।

 

वर्ष 1937 में इस गीत को लेकर विवाद तब उभरा था, जब मुस्लिम नेतृत्व के एक वर्ग ने ‘आनंद मठ’ की पृष्ठभूमि और गीत के बाद के अंतरों पर आपत्ति जताई थी। जवाहरलाल नेहरू ने भी उस समय सुभाष चंद्र बोस को लिखे पत्र में आशंका जताई थी कि उपन्यास की पृष्ठभूमि के कारण मुस्लिम समुदाय की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

 

रवींद्रनाथ टैगोर से भी इस मुद्दे पर राय ली गई थी। माना जाता है कि टैगोर ने पहले दो अंतरों को व्यापक रूप से स्वीकार्य बताया था, जबकि बाद के अंतरों में मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से किए जाने के कारण धार्मिक आपत्तियों की संभावना थी।

 

अब कांग्रेस के फैसले के बाद पुराना ऐतिहासिक विवाद एक बार फिर मौजूदा राजनीति के केंद्र में आ गया है। बीजेपी इसे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सम्मान का मुद्दा बता रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में तय अपनी ऐतिहासिक परंपरा का ही पालन कर रही है।

 

विश्लेषण: इतिहास, आस्था और राजनीति के बीच ‘वंदे मातरम्’

‘वंदे मातरम्’ पर मौजूदा विवाद केवल गीत के कितने अंतरे गाए जाएं, इसका विवाद नहीं है। इसके पीछे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, धार्मिक संवेदनशीलता, राष्ट्रवाद की अलग-अलग व्याख्याएं और वर्तमान राजनीतिक संघर्ष—सभी जुड़े हुए हैं।

कांग्रेस का पक्ष ऐतिहासिक निरंतरता पर आधारित है। पार्टी का कहना है कि 1937 में व्यापक स्वीकार्यता को ध्यान में रखते हुए पहले दो अंतरों को अपनाया गया था और वही परंपरा आज भी जारी है। दूसरी ओर बीजेपी इसे अधूरा राष्ट्रवाद बताकर कांग्रेस की पुरानी नीति को तुष्टीकरण से जोड़ रही है।

 

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इतिहास को आज की राजनीति की कसौटी पर देखा जाए या उस दौर की परिस्थितियों और सामाजिक संवेदनशीलताओं के संदर्भ में समझा जाए। ‘वंदे मातरम्’ निस्संदेह स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरक ध्वनि रहा है, लेकिन इसके विभिन्न अंतरों की धार्मिक व्याख्याओं पर लंबे समय से बहस भी मौजूद है।

ऐसे में यह विवाद आने वाले दिनों में केवल सांस्कृतिक बहस तक सीमित नहीं रहेगा। इसके राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई दे सकते हैं, क्योंकि राष्ट्रवाद और धार्मिक पहचान भारतीय राजनीति के अत्यंत संवेदनशील मुद्दे हैं।