डॉ. गौतम पाण्डेय
का विश्लेषण
जोहान्सबर्ग में आयोजित G20 शिखर
सम्मेलन भारत के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रिय
भागीदारी, उनके नेतृत्व में भारत की नीतिगत पहलें, और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत
रूप से प्रस्तुत करना—ये सब इस समिट में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का प्रमाण हैं।
अमेरिका के बहिष्कार के कारण समिट के कुछ पहलू प्रभावित जरूर हुए, लेकिन इसके बावजूद
भारत की उपस्थिति और प्रभाव केंद्र में रहा। पूरी दुनिया ने यह महसूस किया कि भारत
अब केवल एक सहभागी राष्ट्र ही नहीं, बल्कि वैश्विक मुद्दों पर दिशा दिखाने वाला एक
मजबूत नेता बन चुका है।
प्रधानमंत्री मोदी की सक्रिय
भूमिका और उनके संबोधन
इस समिट में प्रधानमंत्री मोदी
ने तीन प्रमुख सत्रों को संबोधित किया, जहाँ उन्होंने विश्व के समक्ष भारत का दृष्टिकोण
स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से रखा। उनके भाषणों में "समावेशी और सतत विकास",
"जलवायु परिवर्तन", "आपदा प्रबंधन", "कर्ज राहत व्यवस्था"
और "वैश्विक आर्थिक स्थिरता" जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
मोदी ने यह संदेश दिया कि वैश्विक
चुनौतियाँ केवल बड़े और विकसित देशों की समस्या नहीं हैं, बल्कि इनका सबसे अधिक प्रभाव
विकासशील और गरीब देशों पर पड़ता है। इसलिए समाधान भी ऐसा होना चाहिए जो ‘सभी’ के हित
को केंद्र में रखे।
उन्होंने "ग्लोबल साउथ"
यानी विकासशील देशों के हितों को भी दृढ़ता से उठाया। यह श्रेणी उन देशों की है जिन्हें
दुनिया की राजनीति और निर्णय प्रक्रिया में अक्सर पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। मोदी
ने यह सुनिश्चित किया कि उनके मुद्दे—जैसे कर्ज राहत, जलवायु-फंडिंग, ऊर्जा सुरक्षा
और सामाजिक असमानताओं—को वैश्विक स्तर पर प्राथमिकता मिले।
IBSA (India – Brazil –
South Africa) और त्रिपक्षीय सहयोग
जोहान्सबर्ग में प्रधानमंत्री
मोदी ने IBSA (भारत–ब्राजील–दक्षिण अफ्रीका) के नेताओं के साथ बैठक भी की। यह सहयोग
मंच तीन बड़े लोकतांत्रिक देशों को साथ लाता है, जो दुनिया के दक्षिणी हिस्से या विकासशील
देशों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि तीनों देश—वैश्विक व्यापार, समुद्री
सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सहयोग—पर रणनीतिक रूप से कई समान मुद्दों को साझा
करते हैं। इस त्रिपक्षीय संवाद ने आने वाले वर्षों में आपसी सहयोग को और मजबूत बनाने
की दिशा तय की।
कूटनीतिक मुलाकातें और उनके लाभ:
G20 समिट के दौरान प्रधानमंत्री
मोदी ने विश्व के कई शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। इनमें खास तौर पर शामिल थे:
- ऑस्ट्रेलिया
के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज
- ब्राज़ील
के राष्ट्रपति
- दक्षिण
अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा
- इटली
के प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी
इन मुलाकातों में कई अहम मुद्दों
पर चर्चा हुई:
आर्थिक सहयोग - भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था
है और वैश्विक निवेशकों के लिए एक आकर्षक बाजार भी। इन मुलाकातों ने व्यापार बढ़ाने,
निवेश को प्रोत्साहित करने और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोले।
तकनीकी साझेदारी - AI, साइबर सुरक्षा, डिजिटल गवर्नेंस
और ग्रीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत की क्षमता लगातार बढ़ रही है। इन क्षेत्रों
में सहयोग भविष्य में बड़े आर्थिक और सैन्य परिवर्तन ला सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु नीति
- भारत की ऊर्जा
जरूरतें बढ़ रही हैं, और दुनिया भी नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रही है। इन बैठकों
के जरिए भारत को नए निवेश, हरित ऊर्जा साझेदारी और जलवायु फंड तक पहुंच का अवसर मिला।
वैश्विक व्यापार - मोदी के साथ इन नेताओं की बातचीत
से व्यापार को संतुलित और पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय
बाज़ार में और मजबूती मिलेगी।
इन मुलाकातों ने भारत की कूटनीतिक
स्थिति को मजबूत किया और यह संदेश दिया कि भारत विश्व मंच पर एक विश्वसनीय साझेदार
है।
G20 समिट से भारत को मिले फायदे:
भारत की वैश्विक छवि को मजबूती
· समावेशी विकास और पर्यावरण के
प्रति जिम्मेदार नेतृत्व के कारण भारत की छवि एक दूरदर्शी और स्थिर राष्ट्र के रूप
में उभरकर सामने आई।
· ग्लोबल साउथ की आवाज को नई शक्ति
· कर्ज राहत, जलवायु फंडिंग और
विकासशील देशों की समस्याओं को जिस स्पष्टता से मोदी ने रखा, उसने भारत को उनका स्वयंभू
नेता बना दिया।
· त्रिपक्षीय सहयोग हुआ मजबूत
· IBSA बैठक ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक
ताकतों के पुनर्गठन में भारत की भूमिका को बढ़ाया।
· जलवायु नीति पर भारत की भूमिका
बढ़ी
· आपदा प्रबंधन, ऊर्जा सुरक्षा
और पर्यावरण संरक्षण में भारत को वैश्विक नेतृत्व का अवसर मिला।
G20 समिट की चुनौतियाँ और नुकसान:
प्रमुख देशों की अनुपस्थिति -
अमेरिका, रूस
और चीन के शीर्ष नेता इस समिट में शामिल नहीं हुए। इससे कई महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों
पर चर्चा अधूरी रह गई।
अमेरिका का बहिष्कार और कूटनीतिक
तनाव - अमेरिका
के एकतरफा बहिष्कार ने G20 की विश्वसनीयता और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े
किए।
वैश्विक सुरक्षा पर ठोस नीति
का अभाव - क्योंकि
प्रमुख देश उपस्थित नहीं थे, इसलिए आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, और वैश्विक शांति जैसे
मुद्दों पर ठोस निर्णय नहीं हो पाए।
अमेरिका के बहिष्कार के प्रभाव:
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस निर्णय
ने वैश्विक राजनीति में नई बहस को जन्म दिया। बहिष्कार का कारण दक्षिण अफ्रीका में
श्वेत किसानों के कथित दुर्व्यवहार को बताया गया, जिसे दक्षिण अफ्रीका सरकार ने खारिज
कर दिया।
इस कदम के तीन बड़े परिणाम हुए:
अमेरिका की वैश्विक भूमिका पर
प्रश्नचिन्ह - G20
जैसे महत्वपूर्ण मंच से अनुपस्थित रहने का अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय छवि पर नकारात्मक
प्रभाव पड़ा।
भारत और चीन को बढ़त - अमेरिका की अनुपस्थिति से वैश्विक
दक्षिण पर भारत और चीन का प्रभाव और बढ़ा।
कूटनीतिक संदेश - दक्षिण अफ्रीका द्वारा अमेरिका
के लिए “खाली कुर्सी” रखकर प्रतीकात्मक विरोध दिखाया गया—यह संदेश था कि मंच पर अनुपस्थिति
के बावजूद निर्णय आगे बढ़ेंगे।
विश्लेषण
प्रधानमंत्री मोदी की जोहान्सबर्ग
यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक रही। उन्होंने न केवल भारत की शक्ति और नीति का प्रभाव
दिखाया, बल्कि यह सुनिश्चित किया कि विकासशील देशों की आवाज़ को वह स्थान मिले जिसका
वे लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।
अमेरिका के बहिष्कार ने भले ही
समिट के कई पहलुओं को प्रभावित किया, लेकिन भारत के लिए यह अवसर बनकर सामने आया। मोदी
की भागीदारी ने G20 को संतुलित, बहुपक्षीय और दक्षिण-उन्मुख मंच के रूप में स्थापित
करने में योगदान दिया।
आने वाले समय में जब वैश्विक
राजनीति आर्थिक अस्थिरता, जलवायु संकट और तकनीकी बदलावों से गुजर रही है, ऐसे में भारत
की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती जाएगी। G20 में मोदी की सक्रियता केवल एक शिखर सम्मेलन
की सफलता नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक बड़े नेतृत्व की नींव है।
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