भारतीय राजनीति में आत्मविश्वास कोई नई चीज नहीं है, लेकिन जब यह आत्मविश्वास “सिर्फ हम ही सही हैं” वाली मानसिकता में बदल जाए, तो मामला थोड़ा दिलचस्प—और थोड़ा खतरनाक—हो जाता है। आज हम बात कर रहे हैं दो ऐसे मुख्यमंत्रियों की, जो खुद को व्यवस्था से ऊपर नहीं तो कम से कम उसके बराबर जरूर मानते हैं—ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल

 

दोनों में एक अद्भुत समानता है—केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं, जांच एजेंसियों पर भरोसा नहीं, और अब तो न्यायपालिका पर भी सवाल! यानी अगर इनकी बात मान लें, तो इस देश में भरोसा करने लायक अगर कोई है, तो बस ये दोनों ही हैं।

 

ममता बनर्जी: “मैं ही वकील, मैं ही न्याय”

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का कद इतना बड़ा है कि वे खुद को हर भूमिका में फिट कर लेती हैं—नेता, आंदोलनकारी, और जरूरत पड़े तो वकील भी। मामला तब गरमाया जब कोलकाता में IPAC के दफ्तर पर ED की रेड पड़ी। कहा गया कि वहां से चुनावी रणनीति से जुड़ी अहम फाइल जब्त की जा रही थी।

लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब ममता बनर्जी खुद वहां पहुंचीं और एक हरे रंग की फाइल उठाकर ले गईं। अब इसे आप “राजनीतिक साहस” कहिए या “जांच में हस्तक्षेप”—बहस जारी है।

 

मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया, और यहां ममता दीदी ने खुद अपनी पैरवी करने का फैसला किया। उन्होंने केंद्र सरकार पर तीखे आरोप लगाए, लेकिन कोर्ट का रुख कुछ अलग ही था।

जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने साफ कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि कोई मुख्यमंत्री खुद जांच प्रक्रिया में इस तरह दखल देगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह “राज्य बनाम केंद्र” का मुद्दा नहीं, बल्कि “एक व्यक्ति बनाम कानून” का मामला है।

संविधान विशेषज्ञों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि शायद डॉ. बी आर आंबेडकर और सिरवाई जैसे विद्वानों ने भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी।

यानी संदेश साफ था—कुर्सी बड़ी हो सकती है, लेकिन कानून उससे भी बड़ा है।

 

अरविंद केजरीवाल: “जज पर भी शक!”

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अब आते हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर। शराब नीति मामले में जब कानूनी पेंच कसने लगे, तो केजरीवाल ने अदालत में एक दिलचस्प दलील पेश की।

उन्होंने जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से कहा कि वे इस केस से खुद को अलग कर लें, क्योंकि उनकी विचारधारा अलग है और उन्हें निष्पक्ष न्याय मिलने पर संदेह है।

अब सोचिए, अदालत में खड़े होकर जज को ही कह देना कि “मुझे आप पर भरोसा नहीं”—यह आत्मविश्वास है या रणनीति?

 

केजरीवाल ने यह भी तर्क दिया कि जज के बच्चे वकील हैं और सरकार के साथ काम करते हैं, इसलिए निष्पक्षता पर सवाल उठता है। लेकिन जस्टिस शर्मा ने भी जवाब में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उन्होंने साफ कहा—“यह आप तय नहीं करेंगे कि जज के बच्चे क्या करेंगे। जब नेता का बच्चा नेता बन सकता है, तो जज का बच्चा वकील क्यों नहीं?”

साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जब इसी अदालत से राहत मिली थी, तब ये सवाल क्यों नहीं उठे?

अंत में उन्होंने केस से हटने से इनकार कर दिया और संकेत दिया कि अदालत की गरिमा को इस तरह चुनौती नहीं दी जा सकती।

 

राजनीति या मानसिकता?

अब सवाल उठता है—क्या ये दोनों नेता खुद को सिस्टम से ऊपर मानते हैं? या फिर यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है?

दोनों ही मामलों में एक पैटर्न दिखता है—जब जांच या न्यायिक प्रक्रिया अपने खिलाफ जाती दिखे, तो पूरे सिस्टम पर सवाल उठा दो। इससे समर्थकों में सहानुभूति भी मिलती है और राजनीतिक नैरेटिव भी बनता है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है—अगर जनता का भरोसा संस्थाओं से उठने लगे, तो लोकतंत्र की नींव ही कमजोर हो जाती है।

 

विश्लेषण

ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के हालिया रुख को केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। यह एक व्यापक राजनीतिक ट्रेंड का हिस्सा है, जहां नेता संस्थाओं पर सवाल उठाकर खुद को “पीड़ित” और “सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाला” दिखाते हैं।

यह रणनीति अल्पकालिक राजनीतिक लाभ जरूर देती है—समर्थकों का ध्रुवीकरण होता है और नैरेटिव पर पकड़ मजबूत होती है। लेकिन दीर्घकाल में यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती है।

सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया और निचली अदालतों की गरिमा पर सवाल उठाना एक खतरनाक प्रवृत्ति बन सकती है, क्योंकि इससे आम जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा डगमगा सकता है।

अंततः लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का खेल नहीं है, बल्कि संस्थाओं के सम्मान और संतुलन का भी नाम है। अगर हर नेता खुद को ही अंतिम सत्य मानने लगे, तो “लोकतंत्र” धीरे-धीरे “व्यक्तित्व तंत्र” में बदल सकता है।

Video Link: https://youtu.be/udSr4M-KW14