देश की राजनीति
में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण
देने से जुड़े नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संशोधन विधेयक) का लोकसभा में पास न हो
पाना अब सियासी बहस का केंद्र बन गया है। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष
आमने-सामने हैं।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने शनिवार शाम देश को संबोधित करते हुए इस पर गहरा दुख व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बिल को पास कराने के लिए भरसक प्रयास किए, लेकिन दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह संभव नहीं हो सका।
प्रधानमंत्री ने
भावुक लहजे में कहा,
“देश की करोड़ों माताओं और बहनों के सपनों को ठेस पहुंची है। मैं
उनसे माफी मांगता हूं कि हम इस बार सफल नहीं हो पाए।”
लोकसभा में इस
विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230
वोट आए। हालांकि, संविधान संशोधन के लिए
आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा पार नहीं हो सका, जिसके
चलते बिल गिर गया।
विपक्ष
पर सीधा हमला
प्रधानमंत्री
मोदी ने विपक्षी दलों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि कुछ पार्टियों के लिए “दलहित”
देशहित से बड़ा हो गया है। उन्होंने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी,
टीएमसी और डीएमके जैसी पार्टियों पर आरोप लगाया कि ये “परिवारवादी
राजनीति” के कारण महिलाओं के हितों की अनदेखी कर रही हैं।
उन्होंने कहा,
“जब नारी शक्ति का इतना बड़ा प्रस्ताव गिरा, तब
विपक्षी दल खुशियां मना रहे थे। देश की महिलाएं इसे कभी माफ नहीं करेंगी।”
प्रधानमंत्री ने
कांग्रेस पर विशेष निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने एक बार फिर “इतिहास रचने का
मौका खो दिया” और अपने पुराने “वर्क कल्चर—लटकाना, भटकाना और अटकाना” को
दोहराया।
विपक्ष
का पलटवार
वहीं दूसरी ओर
विपक्ष ने सरकार के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi और कांग्रेस सांसद Priyanka Gandhi ने सरकार पर
गंभीर आरोप लगाए।
राहुल गांधी ने
कहा कि यह सिर्फ महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि सरकार संविधान
की मूल भावना को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र
सरकार दक्षिण भारतीय राज्यों, पूर्वोत्तर राज्यों और छोटे
राज्यों के साथ भेदभाव कर रही है।
प्रियंका गांधी
ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि महिलाओं के नाम पर राजनीति हो रही है, लेकिन असल में संविधान और संघीय ढांचे पर हमला किया जा रहा है।
संसद
में क्यों नहीं पास हुआ बिल?
यह विधेयक एक
संवैधानिक संशोधन से जुड़ा था, जिसके लिए संसद में उपस्थित और
मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। हालांकि एनडीए
सरकार साधारण बहुमत में मजबूत दिखी, लेकिन आवश्यक विशेष
बहुमत नहीं जुटा पाई।
यही कारण रहा कि
महिला आरक्षण से जुड़े इस अहम संशोधन को मंजूरी नहीं मिल सकी।
विश्लेषण
महिला आरक्षण
संशोधन बिल का लोकसभा में गिरना केवल एक विधायी असफलता नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में गहराते ध्रुवीकरण का संकेत है। सत्ता पक्ष इसे
महिलाओं के अधिकारों पर हमला बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे
संविधान और संघीय ढांचे की रक्षा का मामला बता रहा है।
प्रधानमंत्री
मोदी का भावनात्मक संबोधन यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को जनभावनाओं से
जोड़कर देख रही है, खासकर महिलाओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने
के नजरिए से। दूसरी ओर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का बयान इस बहस को क्षेत्रीय
असंतुलन और संवैधानिक मूल्यों की दिशा में मोड़ने का प्रयास है।
असल सवाल यह है
कि क्या यह मुद्दा वास्तव में महिलाओं के अधिकारों का है या फिर राजनीतिक रणनीति
का हिस्सा बन चुका है। बिल के गिरने से यह साफ हो गया है कि संसद में सहमति बनाना
अब पहले से ज्यादा कठिन हो गया है।



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