महिला सशक्तिकरण आज भारतीय राजनीति और समाज का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। संसद से लेकर सड़कों तक, हर मंच पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात होती है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम जैसे ऐतिहासिक कदम भी इसी दिशा में उठाए गए हैं, जिनका उद्देश्य राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना है। लेकिन जब वास्तविक सत्ता की बात आती है, तो अक्सर ये सारे प्रयास अधूरे नजर आते हैंखासकर राज्य स्तर की राजनीति में।

बिहार की राजनीति इसका ताजा उदाहरण बनकर सामने आई है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में, जहां मुख्यमंत्री पद को लेकर कई कयास लगाए जा रहे थे, वहां अंततः नेतृत्व एक पुरुष नेतासम्राट चौधरीके हाथों में गया। इसके साथ ही एक सवाल फिर से उभरकर सामने आया – “क्या बिहार में कोई महिला इस पद के योग्य नहीं है, या फिर राजनीति की संरचना ही महिलाओं के खिलाफ है?”

 

राजनीति बनाम सशक्तिकरण

सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो महिला सशक्तिकरण का अर्थ हैनिर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की समान भागीदारी। लेकिन राजनीति में यह आदर्श अक्सर व्यावहारिकता के सामने कमजोर पड़ जाता है। यहां सबसे अधिक महत्व दिया जाता हैअनुभव, जनाधार, संगठनात्मक पकड़ और सबसे अहम, पार्टी हाईकमान तक पहुंच।

यही वह बिंदु है जहां महिलाएं अक्सर पीछे छूट जाती हैं। पुरुष-प्रधान राजनीतिक ढांचे में महिलाओं को तो उतने अवसर मिलते हैं और ही उतनी स्वतंत्रता कि वे खुद को शीर्ष नेतृत्व के रूप में स्थापित कर सकें।

 

क्या बीजेपी का निर्णय संकेत देता है?

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि किसी एक पार्टी ने जानबूझकर महिलाओं को दरकिनार किया। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल अक्सरसेफ चॉइसकी ओर झुकते हैंऐसे नेता जो पहले से स्थापित हों, जिनकी पकड़ मजबूत हो और जो चुनावी गणित को साध सकें।

संभव है कि बीजेपी के आला कमान ने यह आकलन किया हो कि बिहार जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक समीकरण वाले राज्य में एक अनुभवी और मजबूत संगठनात्मक पकड़ वाला चेहरा जरूरी है। लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि महिलाओं को इसअनुभवऔरपहुंचतक पहुंचने के अवसर ही कम मिलते हैं।

 

क्या बिहार तैयार नहीं है?

यह तर्क भी अक्सर दिया जाता है किसमाज अभी तैयार नहीं है।लेकिन यह सवाल उठता है — “क्या समाज को तैयार करने की जिम्मेदारी भी राजनीति की नहीं है?”

बिहार कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां महिलाओं ने नेतृत्व की क्षमता नहीं दिखाई हो। पंचायत स्तर पर 50% आरक्षण के बाद हजारों महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं। कई महिला विधायक और मंत्री भी रही हैं, जिन्होंने अपनी कार्यक्षमता साबित की है।

फिर भी, जब बात मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च पद की आती है, तो महिलाओं का नाम चर्चा में भी नहीं आतायह अपने आप में एक संकेत है कि समस्या क्षमता की नहीं, बल्कि अवसर और सोच की है।

 

क्या योग्य महिला नेता नहीं हैं?

यह कहना कि बिहार में कोई योग्य महिला नहीं है, केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है बल्कि यह महिलाओं के योगदान का अपमान भी है। राजनीति में कई ऐसी महिलाएं रही हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में प्रभावशाली काम किया है।

असल समस्या यह है कि महिलाओं को शीर्ष पदों तक पहुंचाने के लिए जिस तरह का राजनीतिक समर्थन, संसाधन और नेटवर्क चाहिए, वह उन्हें बहुत कम मिलता है। पार्टी के भीतर भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी सीमित रहती है।

 

समाधान क्या है?

अगर वास्तव में महिला सशक्तिकरण को जमीन पर उतारना है, तो केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:

राजनीतिक दलों में आंतरिक सुधारमहिलाओं को संगठन में महत्वपूर्ण पद दिए जाएं।

नेतृत्व का निर्माणमहिलाओं को प्रशिक्षण और अवसर दिए जाएं ताकि वे बड़े पदों के लिए तैयार हो सकें।

सामाजिक सोच में बदलावसमाज को यह स्वीकार करना होगा कि नेतृत्व क्षमता लिंग पर निर्भर नहीं करती।

राजनीतिक इच्छाशक्तिपार्टियों को जोखिम उठाकर महिलाओं को शीर्ष पदों पर लाना होगा।

 

निष्कर्ष

बिहार में महिला मुख्यमंत्री का होना यह नहीं दर्शाता कि यहां योग्य महिलाओं की कमी है। बल्कि यह इस बात का संकेत है कि राजनीति अभी भी पूरी तरह से समावेशी नहीं हो पाई है।

महिला सशक्तिकरण केवल नारों और कानूनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जब तक महिलाएं वास्तविक सत्ता के केंद्र में नहीं पहुंचेंगी, तब तक यह अधूरा ही रहेगा।

अंततः सवाल यही है
क्या हम सच में महिलाओं को नेतृत्व देना चाहते हैं, या सिर्फ उनके नाम पर राजनीति करना चाहते हैं?

लेखक डॉ. गौतम पाण्डेय GPNBihar के प्रधान संपादक हैं।

वीडियो लिंक: https://youtu.be/X3mF_ua3YAA

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