डॉ. गौतम पाण्डेय का ब्लॉग:
बिहार में
चुनावी रंग लगातार बदलते नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य की राजनीतिक
तस्वीर में नए खिलाड़ी उभर कर सामने आए हैं, जिनमें AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी शामिल है। ओवैसी की पार्टी कुछ
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सक्रियता दिखाती रही है, और
पिछले विधानसभा चुनाव में पूर्णिया और किशनगंज के कुछ हिस्सों में सीटें भी जीत
चुकी है।
हालांकि, इस बार का चुनावी परिदृश्य कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा है। सूत्रों की
मानें तो ओवैसी लगातार INDI गठबंधन के नेताओं से यह अपेक्षा
कर रहे हैं कि उन्हें भी इस गठबंधन में शामिल किया जाए। लेकिन, तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) इस खुसामदगी की अनदेखी कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का
कहना है कि इसका कारण साफ है। बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों में AIMIM का जनाधार सीमित है। ओवैसी की पार्टी केवल उन्हीं क्षेत्रों में
प्रभावशाली साबित हुई है, जहां RJD या
कांग्रेस ने चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे। ऐसे इलाकों में मुस्लिम वोट
सीधे AIMIM की ओर चला गया। यदि RJD या
कांग्रेस अपने उम्मीदवार उतारते हैं, तो मुस्लिम मतदाता
सामान्यतया उन पार्टियों को ही प्राथमिकता देते हैं।
तेजस्वी यादव का
दृष्टिकोण भी यही दर्शाता है कि AIMIM को गठबंधन में शामिल करना
उनके लिए फायदेमंद नहीं है। उनके अनुसार, ओवैसी का प्रभाव
केवल RJD के वोट बैंक की कमजोर उपस्थिति में दिखाई देता है,
न कि स्वतंत्र जनाधार के कारण। इस रणनीति से तेजस्वी सुनिश्चित करना
चाहते हैं कि पूरे मुस्लिम वोट बैंक RJD के पाले में रहे और AIMIM
को अपना क्षेत्र सीमित करना पड़े।
पिछले चुनावों
का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि AIMIM की सफलता केवल
चुनावी परिदृश्य और उम्मीदवारों के निर्णय पर निर्भर रही है। उदाहरण के लिए,
किशनगंज और पूर्णिया में AIMIM ने तब जीत दर्ज
की थी, जब वहां RJD और कांग्रेस ने
उम्मीदवार नहीं उतारे। इसका अर्थ यह है कि ओवैसी की पार्टी अपनी लोकप्रियता के दम
पर चुनाव नहीं जीत पा रही है।
राजनीतिक
विश्लेषक मानते हैं कि बिहार का मुस्लिम वोटर परंपरागत रूप से RJD और कांग्रेस के प्रति वफादार है। AIMIM केवल
अवसरवादी चुनावी क्षेत्र में अस्थायी प्रभाव डालती है। इस बार भी तेजस्वी यादव ने
स्पष्ट संकेत दिए हैं कि AIMIM को गठबंधन में जगह नहीं
मिलेगी। यह कदम RJD की रणनीति को मजबूत बनाता है और AIMIM
के विस्तार की संभावनाओं को सीमित करता है।
विशेषज्ञों का
यह भी मानना है कि ओवैसी का बिहार में विस्तार प्रयास अधिकतर शहरी और सीमावर्ती
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों तक ही सीमित रहेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पकड़ कमजोर
है। RJD की मजबूत संगठन संरचना और परंपरागत वोट बैंक AIMIM के
दावों को चुनौती देती है।
इस रणनीति का
राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। यदि मुस्लिम वोट बैंक RJD के पक्ष में स्थिर रहता है और AIMIM को ज्यादा
हिस्सेदारी नहीं मिलती है, तो आगामी विधानसभा चुनाव में
ओवैसी की पार्टी का प्रभाव काफी हद तक खत्म हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषण से यह भी
कहा जा रहा है कि AIMIM के द्वारा किसी सीट पर जीत दर्ज करना
केवल इसी चुनावी परिदृश्य की देन होगी, न कि उनकी पार्टी की
मजबूत जनप्रियता की वजह से।
इसके अलावा, AIMIM का गठबंधन में शामिल न होना यह संकेत भी देता है कि तेजस्वी यादव अपने
उम्मीदवारों और क्षेत्रीय चुनावी रणनीति को पहले प्राथमिकता दे रहे हैं। उनका मकसद
है कि कोई भी वोट बैंक किसी अन्य पार्टी के पाले में न जाए और विशेषकर मुस्लिम
वोटों का बड़ा हिस्सा RJD के पक्ष में ही रहे।
पिछले विधानसभा
चुनावों में भी यह देखा गया कि AIMIM के चुनावी अभियान का अधिक
प्रभाव तब दिखा जब RJD और कांग्रेस ने वोटिंग क्षेत्र में
पूरी ताकत से भाग नहीं लिया। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि AIMIM का असर अस्थायी और अवसरवादी है। अगर आगामी चुनाव में RJD और कांग्रेस दोनों उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं, तो
मुस्लिम मतदाता अपने पारंपरिक दलों को ही प्राथमिकता देंगे।
राजनीतिक
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि बिहार में AIMIM की राजनीति का
भविष्य कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण है। उनकी पार्टी की जीत का पैटर्न अधिकतर ऐसे इलाकों
तक ही सीमित है, जहां मुख्यधारा की पार्टियों ने कदम नहीं
रखा हो। तेजस्वी यादव की यह रणनीति AIMIM की संभावनाओं को
सीमित करती है और यह सुनिश्चित करती है कि बिहार में मुस्लिम वोटर का एक बड़ा
हिस्सा RJD के पक्ष में ही रहे।
कुल मिलाकर कहा
जा सकता है कि बिहार में AIMIM का जनाधार अभी भी सीमित है। यह मुख्य रूप से
चुनावी अवसरवाद पर निर्भर है। तेजस्वी यादव की रणनीति और RJD का मजबूत संगठनात्मक ढांचा यह संकेत दे रहे हैं कि आगामी चुनाव में AIMIM
का प्रभाव न के बराबर रहेगा। यदि RJD और
कांग्रेस अपने उम्मीदवार उतारते हैं, तो मुस्लिम वोटिंग
पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।
अंततः यह कहना
उचित होगा कि बिहार में AIMIM का राजनीतिक भविष्य वर्तमान परिस्थितियों में
चुनौतीपूर्ण है। ओवैसी की पार्टी केवल कुछ विशेष क्षेत्रों में ही सक्रिय दिखती है
और उनका वास्तविक जनाधार शून्य के करीब है। तेजस्वी यादव और RJD की रणनीति यह सुनिश्चित करेगी कि मुस्लिम वोट उनके पाले में ही रहे और AIMIM
का चुनावी प्रभाव सीमित रहे।



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