संयुक्त राष्ट्र: उम्मीदों का
वैश्विक मंच
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद
1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र का मूल उद्देश्य था—विश्व शांति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय
सहयोग को बढ़ावा देना। महासभा, सुरक्षा परिषद, शांति स्थापना मिशन और मानवीय एजेंसियों
के माध्यम से यह संस्था देशों के बीच संवाद और समाधान का मंच बनी। लेकिन आज जब पश्चिम
एशिया में अमेरिका–इज़राइल–ईरान तनाव उफान पर है और यूरोप में रूस–यूक्रेन युद्ध जारी
है, तो सवाल उठता है—कहाँ है संयुक्त राष्ट्र?
रूस–यूक्रेन युद्ध: सुरक्षा परिषद
की जकड़न
फरवरी 2022 में शुरू हुआ रूस–यूक्रेन
युद्ध वैश्विक राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष पर
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में कई प्रस्ताव आए, लेकिन रूस—जो स्वयं स्थायी सदस्य
है—ने अपने वीटो अधिकार का उपयोग कर अधिकांश प्रस्तावों को रोक दिया। यह वही संरचनात्मक
कमजोरी है जो संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
महासभा ने रूस की कार्रवाई की
निंदा की, मानवीय सहायता की अपील की, परंतु उसके प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते। परिणामतः
युद्धविराम या ठोस समाधान की दिशा में संयुक्त राष्ट्र निर्णायक भूमिका नहीं निभा सका।
अमेरिका–इज़राइल–ईरान तनाव: कूटनीति
बनाम शक्ति राजनीति
पश्चिम एशिया में ईरान, इज़राइल
और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाला
है। परमाणु कार्यक्रम, प्रॉक्सी युद्ध और गाजा जैसे मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की
बैठकों में तीखी बहस तो हुई, पर ठोस समाधान सामने नहीं आया।
यहाँ भी सुरक्षा परिषद की राजनीति
निर्णायक रही। अमेरिका अक्सर इज़राइल के पक्ष में वीटो का उपयोग करता है, जबकि अन्य
देश अपने-अपने रणनीतिक हित साधते हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका एक “चर्चा
मंच” तक सीमित हो जाती है, न कि निर्णायक शांति निर्माता की।
वीटो शक्ति: शक्ति संतुलन या
बाधा?
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी
संरचनात्मक चुनौती है—सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों (P5) का वीटो अधिकार। जब
भी किसी प्रस्ताव से उनके राष्ट्रीय हित प्रभावित होते हैं, वे उसे रोक देते हैं। परिणामस्वरूप
वैश्विक सहमति का तंत्र महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में फँस जाता है।
यह व्यवस्था 1945 की शक्ति-संतुलन
राजनीति पर आधारित थी, पर 21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया में यह मॉडल अक्सर निष्प्रभावी
दिखता है। भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान जैसे देश लंबे समय से सुधार की मांग कर रहे
हैं, पर संरचनात्मक बदलाव अब तक अधूरा है।
क्या संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह
विफल है?
यह कहना भी एकांगी होगा कि संयुक्त
राष्ट्र पूरी तरह विफल है। युद्ध क्षेत्रों में मानवीय सहायता, शरणार्थी राहत, खाद्य
कार्यक्रम और शांति सेना के माध्यम से लाखों लोगों को राहत मिली है। विश्व स्वास्थ्य,
जलवायु परिवर्तन और विकास लक्ष्यों पर भी यह मंच महत्वपूर्ण है।
समस्या यह है कि जब महाशक्तियाँ
सीधे टकराव में हों, तब संयुक्त राष्ट्र के पास “नैतिक अपील” तो है, पर “प्रभावी दंडात्मक
शक्ति” नहीं। उसकी ताकत सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है।
सुधार की जरूरत
रूस–यूक्रेन और अमेरिका–इज़राइल–ईरान
संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना 21वीं सदी की जटिल
भू-राजनीति से जूझ रही है। यदि वीटो शक्ति पर पुनर्विचार, सुरक्षा परिषद का विस्तार
और अधिक पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, तो यह संस्था और कमजोर होती जाएगी।
“कहाँ है संयुक्त राष्ट्र?”—यह
प्रश्न केवल संस्था से नहीं, बल्कि उन देशों से भी है जिन्होंने इसे बनाया और चलाते
हैं। जब तक वैश्विक शक्तियाँ अपने संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर सामूहिक शांति को प्राथमिकता
नहीं देंगी, तब तक संयुक्त राष्ट्र एक आशा का प्रतीक तो रहेगा, पर प्रभावी समाधान का
केंद्र नहीं बन पाएगा।
आज आवश्यकता है—सुधार, संतुलन
और वास्तविक बहुपक्षीयता की। तभी संयुक्त राष्ट्र अपने मूल उद्देश्य—विश्व शांति—को
सार्थक कर पाएगा।
अब यहाँ एक और महत्वपूर्ण सवाल
उठता है और कई लोगों के मन में भी ये सवाल होता है कि क्या वीटो के ऊपर वीटो लगाया
जा सकता है। मतलब, मान लीजिये कि किसी मुद्दे पर अमेरिका ने वीटो लगाया तो क्या उसी
मुद्दे पर उसी समय रूस भी वीटो लगा सकता है ताकि अमेरिका का वीटो निरस्त हो जाए?
इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर है
— नहीं। एक वीटो पर दूसरा वीटो नहीं लगाया जा सकता।
अब इसे विस्तार से समझते हैं:
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
में वीटो कैसे काम करता है?
सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य होते
हैं: 5 स्थायी सदस्य (P5): संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, और यूनाइटेड किंगडम।
इसके अलावे 10 अस्थाई सदस्य भी होते हैं जो 2 वर्षों के लिए चुने जाते हैं।
वीटो का नियम क्या है?
किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव
(substantive resolution) को पास होने के लिए कम से कम 9 वोट चाहिए और 5 स्थायी
सदस्यों में से कोई भी "ना" में वोट न दे।
यदि किसी एक स्थायी सदस्य ने
"No" वोट दे दिया तो प्रस्ताव तुरंत गिर जाता है। ये NO ही वीटो कहलाता है।
अब असली सवाल कि अगर अमेरिका
ने किसी प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया, तो क्या रूस उस वीटो पर वीटो लगा सकता है?
तो इसका जवाब है - नहीं।
क्योंकि -
· वीटो कोई अलग प्रस्ताव नहीं होता।
- वीटो
सिर्फ "ना" का वोट है।
- एक
बार प्रस्ताव गिर गया, तो वह प्रक्रिया वहीं समाप्त हो जाती है।
- उस
वीटो को रोकने या पलटने का कोई प्रावधान नहीं है।
उदाहरण से समझिए
मान लीजिए प्रस्ताव आया कि "इज़राइल
पर प्रतिबंध लगाया जाए।" 14 देशों ने समर्थन किया लेकिन अमेरिका ने
"No" वोट दिया तो प्रस्ताव तुरंत गिर गया। अब रूस अमेरिका के वीटो को रोक
नहीं सकता। उसके लिए उसे नया प्रस्ताव लाना पड़ेगा और तब फिर कोई भी P5 सदस्य वीटो
कर सकता है।
क्या कभी वीटो को चुनौती दी जा
सकती है?
सीधे तौर पर नहीं। लेकिन दो विकल्प
होते हैं:
पहला, महासभा में जाना - मामले को संयुक्त राष्ट्र महासभा
में ले जाया जा सकता है। महासभा में वीटो नहीं होता। लेकिन, महासभा के प्रस्ताव कानूनी
रूप से बाध्यकारी नहीं होते।
और दूसरा, कूटनीतिक दबाव - वैश्विक जनमत, आर्थिक प्रतिबंध,
क्षेत्रीय गठबंधन आदि।
असली समस्या क्या है?
वीटो प्रणाली 1945 की शक्ति संरचना
पर आधारित है। आज की बहुध्रुवीय दुनिया में यह व्यवस्था अक्सर निर्णय प्रक्रिया को
रोक देती है। इसीलिए, भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान जैसे देश सुरक्षा परिषद में सुधार
और वीटो प्रणाली में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
तो इसका निष्कर्ष ये है कि
वीटो पर दूसरा वीटो नहीं लगाया जा सकता। एक स्थायी सदस्य का "ना" ही
अंतिम होता है। यही कारण है कि बड़े युद्धों में संयुक्त राष्ट्र अक्सर असहाय दिखता
है।
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Video Link: https://youtu.be/fsggTdOoYuw
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