पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से
पहले एनडीए गठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर गजब का पेच फंस गया है। एलजेपी
(रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान अपनी पार्टी के लिए 36 से 40 सीटों की मांग
पर अड़े हुए हैं। इतना ही नहीं, वे न सिर्फ सीटों की संख्या पर, बल्कि कई सहयोगी दलों
की सीटिंग सीटों पर भी दावा ठोक रहे हैं। इस मांग ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा),
जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू) और जीतन राम मांझी की हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के
साथ टकराव को चरम पर पहुंचा दिया है।
सूत्रों के अनुसार, चिराग की
यह रणनीति सीट बातचीत को बेहद जटिल बना रही है। वैसी सीटें, जिन पर मौजूदा विधायक एनडीए
के अन्य घटक दलों के हैं, उन्हें अपनी पार्टी के खाते में डालने की ज़िद गठबंधन के
भीतर असहज माहौल पैदा कर रही है।
मनपसंद सीटों की मांग से बढ़ा
टकराव
सिर्फ सीट संख्या ही नहीं, चिराग
पासवान कई रणनीतिक और प्रतीकात्मक सीटों पर दावा कर रहे हैं। उदाहरण के लिए:
- महनार
सीट –
यह जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा की सीट है। चिराग इस सीट को
अपनी पार्टी के खाते में चाहते हैं, लेकिन जेडीयू इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं
है।
- मटिहानी
सीट –
2020 में एलजेपी रामविलास ने यह सीट जीती थी, हालांकि बाद में विधायक जेडीयू में
शामिल हो गए थे। चिराग इसे दोबारा चाहते हैं, लेकिन जेडीयू इसका विरोध कर रही
है।
चकाई पर ‘तीन तरफा’ दावा
जेडीयू चकाई सीट अपनी ओर रखना
चाहती है क्योंकि यहां से निर्दलीय विधायक सुमित सिंह मंत्री हैं और जेडीयू
का समर्थन करते हैं। वहीं, चिराग इस सीट को भी अपनी पार्टी में शामिल करने पर अड़े
हैं, जिससे स्थिति और पेचीदा हो गई है।
‘अपनों के लिए’ सीटों की मांग
चिराग पासवान की इस सीट मांग
में पार्टी के रणनीतिक सहयोगियों और पुराने नेताओं के हित भी जुड़ गए हैं।
- गोविंदगंज
सीट –
चिराग अपने बिहार प्रदेश अध्यक्ष राजू तिवारी के लिए यह सीट चाहते हैं।
राजू तिवारी 2015 में यहां से विधायक रह चुके हैं। लेकिन मौजूदा विधायक बीजेपी
के हैं, जिससे यह सीट भाजपा छोड़ने को तैयार नहीं।
- ब्रह्मपुर
सीट –
प्रदेश संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष हुलास पांडेय के लिए चिराग यह सीट मांग
रहे हैं।
- महुआ
सीट –
यहां उपेंद्र कुशवाहा भी दावा कर रहे हैं, जिससे यहां दोहरी टकराहट पैदा
हो गई है।
- सिकंदरा
सीट –
यह सीट मांझी की हम पार्टी की सीटिंग सीट है। चिराग इसे भी अपनी पार्टी के खाते
में चाहते हैं, लेकिन मांझी छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
दूसरी मांगी गई सीटें
चिराग पासवान की मांगों में जमुई,
मोरवा, हायाघाट, अलौली, बोधगया, शेरघाटी, बखरी, हिसुआ जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।
इनमें कई सीटों पर मौजूदा एनडीए विधायक हैं या वे विपक्ष से जीतने की उम्मीद रखते हैं,
जिससे इन सीटों पर एलजेपी रामविलास का दावा और भी विवादास्पद हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतने
बड़े पैमाने पर आपसी टकराव वाली सीटों पर दावा करना, गठबंधन के लिए अंतर्कलह का संकेत
है।
रणनीतिक दृष्टिकोण: क्यों अड़े
हैं चिराग?
चिराग पासवान की रणनीति को राजनीतिक
विश्लेषक दो हिस्सों में बांटकर देख रहे हैं:
1. बार्गेनिंग टैक्टिक्स – ज्यादा सीटों और चुनौतीपूर्ण
सीटों की मांग करके अंतिम समझौते में अपनी असल पसंदीदा सीटें हासिल करना।
2. पार्टी का विस्तार – यह सुनिश्चित करना कि
2020 विधानसभा चुनाव की तरह, पार्टी सिर्फ सिम्बॉलिक उपस्थिति न बल्कि निर्णायक वोट
प्रतिशत हासिल करे।
एलजेपी रामविलास 2020 में अकेले
चुनाव लड़ी थी और कई सीटों पर बड़ी संख्या में वोट हासिल किए थे, लेकिन इस बार गठबंधन
में रहते हुए चिराग अपने प्रभाव को अधिकतम करना चाहते हैं।
जेडीयू और बीजेपी की प्रतिक्रिया
जेडीयू इस मुद्दे पर खासा सख्त
रुख अपना रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अपनी सीटिंग सीटें छोड़ने
का मतलब है कि संगठन में अस्थिरता पैदा होना। भाजपा भी उन सीटों को छोड़ने के मूड में
नहीं है जहां उनका मौजूदा विधायक है या जहां मजबूत उम्मीद है। मांझी की पार्टी के लिए
भी सिकंदरा जैसी सीट उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ी है, जिसे छोड़ना उनके लिए आसान नहीं
होगा।
संकट का समाधान या टूट की आशंका?
गठबंधन राजनीति में सीट शेयरिंग
हमेशा एक संवेदनशील मामला होता है, लेकिन चिराग पासवान की मांगें इस बार इसे संकट
मोड में ले गई हैं। यदि समझौता जल्द नहीं हुआ, तो यह मुद्दा गठबंधन की चुनावी रणनीति
को प्रभावित कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, एनडीए के
शीर्ष स्तर पर बैठकों का सिलसिला बढ़ सकता है। लेकिन यदि चिराग अपने रुख में नरमी नहीं
दिखाते, तो यह गांठ खुलना आसान नहीं होगी।
आपात बैठक और संभावित फैसला
इन परिस्थितियों में, आज सुबह
10 बजे पटना में एलजेपी रामविलास के कार्यालय में एक आपात बैठक बुलाई गई। इसकी
अध्यक्षता पार्टी के प्रभारी एवं सांसद अरुण भारती ने की। बैठक में विधानसभा
चुनाव, मौजूदा राजनीतिक हालात, और सीट शेयरिंग विवाद पर विस्तार से चर्चा होने की उम्मीद
है। सूत्रों का कहना है कि बैठक में बड़ा फैसला लिया जा सकता है — चाहे वह सीट मांग
को घटाने का संकेत हो या किसी वैकल्पिक रणनीति अपनाने का।
संभावित परिणाम
- अगर
समझौता हुआ, तो एलजेपी रामविलास गठबंधन में रहकर प्रभावी संख्या में सीटें लड़
सकती है।
- अगर
विवाद बना रहा, तो पार्टी अलग राह पर जाने की घोषणा कर सकती है, जिससे एनडीए के
वोट-बैंक पर असर होगा।
- मनपसंद
सीटों की लड़ाई से गठबंधन का मूड प्रभावित हो सकता है और विपक्षी दल इसे
प्रचार में उभार सकते हैं।
निष्कर्ष



Recent Comments