भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक में जो सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला है, वह है भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का लगातार मजबूत होना और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) का कमजोर पड़ना। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे कई वर्षों की राजनीतिक रणनीति, नेतृत्व का अंतर, और जनता की बदलती प्राथमिकताएँ जिम्मेदार हैं।

 

पूर्व परिस्थितियाँ: कांग्रेस का स्वर्णकाल और पतन की शुरुआत

कांग्रेस लंबे समय तक देश की प्रमुख पार्टी रही। आज़ादी के बाद से लेकर 2014 तक, अधिकांश समय सत्ता में रहकर उसने देश की राजनीतिक दिशा तय की। लेकिन 2004 से 2014 के बीच के शासनकाल में कई घोटाले सामने आए—2G, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स आदि। इन मुद्दों ने कांग्रेस की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया।

इसके साथ ही नेतृत्व का संकट भी उभरकर सामने आया। जनता को ऐसा महसूस होने लगा कि निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो गई है और सरकार में स्पष्ट दिशा का अभाव है। यही वह दौर था जब जनता विकल्प तलाशने लगी।

 

बीजेपी का उदय: मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट एजेंडा

2014 में बीजेपी ने एक मजबूत नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ा और सत्ता में आई। पार्टी ने विकास, राष्ट्रवाद और मजबूत सरकार का नारा दिया। इसके बाद 2019 में भी बीजेपी ने और बड़ी जीत दर्ज की।

बीजेपी की सफलता के पीछे कुछ प्रमुख कारण रहे:

  • मजबूत नेतृत्व: जनता को स्पष्ट और निर्णायक नेतृत्व मिला।
  • संगठन की ताकत: बूथ स्तर तक पार्टी की पकड़ मजबूत हुई।
  • नैरेटिव कंट्रोल: बीजेपी ने अपनी बात जनता तक प्रभावी तरीके से पहुँचाई।
  • विकास और कल्याण योजनाएँ: उज्ज्वला, आयुष्मान, जनधन जैसी योजनाओं ने गरीब तबके को सीधे प्रभावित किया।

 

वर्तमान परिस्थितियाँ: जीत और प्रतिक्रिया

आज की स्थिति में बीजेपी कई राज्यों और केंद्र में मजबूत स्थिति में है। हर चुनाव में उसकी जीत केवल संगठन या संसाधनों की वजह से नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव के कारण भी होती है।

दूसरी ओर, कांग्रेस लगातार हार का सामना कर रही है। कई राज्यों में वह मुख्य विपक्ष की भूमिका भी खो चुकी है। यही कारण है कि जब भी बीजेपी जीत दर्ज करती है, कांग्रेस की प्रतिक्रिया अक्सर आक्रामक और कभी-कभी असंगत दिखाई देती है।

 

बीजेपी की जिम्मेदारी, अधूरे वादे, एंटी-इनकंबेंसी

बीजेपी की लगातार चुनावी जीतों ने उसे देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं। जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से सत्ता में हैजैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या गुजरातवहाँ यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि चुनावों के दौरान किए गए सभी वादे कितनी हद तक पूरे हुए हैं।

कई जगहों पर विकास कार्य हुए हैं, लेकिन बेरोज़गारी, किसानों की आय, और स्थानीय बुनियादी समस्याओं को लेकर जनता में असंतोष भी देखा गया है। यही कारण है कि समय-समय पर एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के संकेत मिलते रहते हैं। जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है।

बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बीजेपी नेघुसपैठका मुद्दा जोर-शोर से उठाया। चुनावी मंचों पर यह एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बना। लेकिन सवाल यह है कि जब पार्टी केंद्र में मजबूत स्थिति में है, तो इस मुद्दे पर तेज और ठोस कार्रवाई क्यों नहीं दिखती? यदि वादे और वास्तविक कार्रवाई के बीच अंतर बना रहता है, तो जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है।

इसके अलावा, प्रचंड बहुमत मिलने के बाद सरकार से अपेक्षाएँ भी बढ़ जाती हैं। जनता मानती है कि अब कोई बहाना नहीं होना चाहिएनीतियाँ तेजी से लागू हों और उनके परिणाम जमीन पर दिखें। यदि ऐसा नहीं होता, तो विपक्ष को मुद्दे मिलते हैं और सत्ता विरोधी माहौल बन सकता है।

अंततः, बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही बनाई उम्मीदों पर खरा उतरना है। चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन लगातार जनता का विश्वास बनाए रखना उससे भी बड़ी परीक्षा है।

 

बौखलाहटक्यों दिखती है?

कांग्रेस की प्रतिक्रिया कोबौखलाहटइसलिए कहा जाता है क्योंकि:

1.     स्पष्ट रणनीति का अभाव:
कांग्रेस अक्सर मुद्दों को उठाती है, लेकिन उनके समाधान या वैकल्पिक नीति पेश नहीं कर पाती।

2.     नेतृत्व पर सवाल:
पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर असमंजस बना रहता है, जिससे संदेश कमजोर पड़ता है।

3.     नैरेटिव में पिछड़ना:
बीजेपी जहां राष्ट्रवाद और विकास की बात करती है, वहीं कांग्रेस का नैरेटिव कई बार स्पष्ट नहीं होता।

4.     हार के बाद प्रतिक्रिया:
चुनाव हारने के बाद आत्ममंथन की बजाय आरोप-प्रत्यारोप पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

 

क्या यह पूरी तरह एकतरफा तस्वीर है?

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि राजनीति में कोई स्थिति स्थायी नहीं होती। बीजेपी की जीत जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है। यदि सरकार अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरती, तो जनता विकल्प तलाशने में देर नहीं करती।

कांग्रेस के पास भी अभी अवसर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यदि वह अपने संगठन को मजबूत करे, स्पष्ट नेतृत्व स्थापित करे और ठोस नीतियाँ पेश करे, तो वह वापसी कर सकती है।

 

निष्कर्ष

बीजेपी की जीत केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक बदलाव का संकेत है। वहीं कांग्रेस की स्थिति यह दिखाती है कि केवल इतिहास के भरोसे राजनीति नहीं चलती।

आज की राजनीति में जनता अधिक जागरूक है और प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लेती है। बीजेपी ने इस बदलाव को समझा और अपने पक्ष में किया, जबकि कांग्रेस अभी भी उस बदलाव के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश कर रही है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस अपनी कमियों को दूर कर मजबूत विपक्ष बन पाती है या बीजेपी का दबदबा और बढ़ता है। राजनीति में यही प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती है।

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Video link: https://youtu.be/awl94mzPejA

Dr. Gautam Pandey (Editor-in-Chief, GPNBihar)

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