राजनीति के शतरंज
पर जनता सिर्फ एक प्यादा - डॉ. गौतम पाण्डेय का विश्लेषण
भारतीय लोकतंत्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। संविधान ने यहाँ जनता को सर्वोच्च स्थान दिया है, "जनता ही जनार्दन है",
यह पंक्ति अक्सर नेताओं के भाषणों में सुनाई देती है। परंतु जब हम धरातल पर उतरकर राजनीति की असलियत देखते हैं, तो पाते हैं कि इस लोकतंत्र के शतरंज पर जनता सिर्फ एक प्यादा बनकर रह गई है। वह हर पाँच साल में मोहरा बनती है, चलती है, बलिदान देती है, पर खेल जीतता कोई और है—नेता, दल, या सत्ता का समीकरण।
राजनीति का
चरित्र: पहले और अब
कभी राजनीति “सेवा” का पर्याय मानी जाती थी। स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गांधी, सरदार पटेल, पंडित नेहरू, जयप्रकाश नारायण जैसे नेता राजनीति को एक लोकसेवा का माध्यम मानते थे। उस समय सत्ता पाने की नहीं, देश बनाने की होड़ थी। आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में भी कई नेता, चाहे वे लाल बहादुर शास्त्री हों या अटल बिहारी वाजपेयी, अपनी सरलता, ईमानदारी और वैचारिक स्थिरता के लिए जाने जाते थे।
परंतु समय के साथ राजनीति का मूल भाव बदल गया। अब यह “सेवा” नहीं, “सत्ता” का माध्यम बन चुकी है। पहले जहाँ विचारधारा और दल के प्रति निष्ठा सर्वोपरि होती थी, वहीं आज स्वार्थ और अवसरवादिता
सर्वोच्च है।
आदर्शवाद से
अवसरवाद तक
का सफर
आज का नेता न राष्ट्र के प्रति समर्पित है, न पार्टी के प्रति, और न ही जनता के प्रति। उसे न देश की चिंता है, न समाज की। चिंता है तो सिर्फ अपनी कुर्सी, अपनी सुविधाओं और अपने भविष्य की। यह प्रवृत्ति आज के हर स्तर की राजनीति में दिखती है – गाँव पंचायत से लेकर संसद तक।
उदाहरण के तौर पर, हाल के वर्षों में आपने कई बार देखा होगा कि कोई नेता एक पार्टी से चुनाव हारते ही दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है। कभी तो वही नेता, जो कल तक किसी दल के खिलाफ ज़हर उगल रहा था, अगले ही दिन उसी दल की प्रशंसा करने लगता है। जनता की नज़र में यह “विश्वासघात” है, लेकिन नेताओं की नज़र में यह “राजनीतिक रणनीति” ।
जनता का
इस्तेमाल, हित का हिसाब
जनता के नाम पर हर चुनाव में भावनाओं का व्यापार किया जाता है। कोई जाति के नाम पर वोट मांगता है, कोई धर्म के नाम पर, कोई क्षेत्रवाद या आरक्षण के नाम पर। जनता के असली मुद्दे—शिक्षा,
रोजगार, स्वास्थ्य,
सुरक्षा—सिर्फ भाषणों में दिखाई देते हैं।
नेता जनता के बीच जाकर वादों की झड़ी लगा देते हैं, पर चुनाव जीतने के बाद वही जनता भूल जाती है। यह स्थिति बताती है कि लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गई है – शतरंज की एक प्यादे की तरह, जिसका इस्तेमाल खेल को आगे बढ़ाने के लिए होता है, पर जीत के बाद उसकी कोई अहमियत नहीं रहती।
दल-बदल की राजनीति: एक बड़ा रोग
आज भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा रोग है दल-बदल। कई नेता चुनाव हारते ही पार्टी बदल लेते हैं। उदाहरण के लिए, एक ही राज्य में ऐसे अनेक चेहरे हैं जिन्होंने तीन-तीन दल बदले, लेकिन हर बार “जनहित” का तर्क दिया। जबकि, हकीकत यह है कि यह जनहित नहीं, स्वहित का खेल होता है। कभी टिकट नहीं मिला, तो पार्टी बदल ली। कभी सत्ता पक्ष कमजोर दिखा, तो विपक्ष में चले गए। इस दल-बदल की राजनीति ने जनता के बीच नैतिकता और वैचारिकता दोनों की गिरावट ला दी है।
पहले की राजनीति में विचारधारा का मूल्य था। नेहरू और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधाराएँ भिन्न थीं, पर दोनों देशहित में अपने मत पर अडिग रहे। आज नेताओं के लिए विचारधारा “रंग बदलने वाली चादर” बन गई है – सत्ता का रंग जैसा हो, वैसा ओढ़ लिया जाता है।
जनता: हर
बार ठगी हुई उम्मीद
हर चुनाव में जनता नई उम्मीद लेकर आती है। वह सोचती है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा – नई सरकार, नए चेहरे, नए वादे। लेकिन नतीजा हर बार वही निकलता है – वादे अधूरे, उम्मीदें अधूरी। जनता का इस्तेमाल केवल चुनावी भीड़ और मतदाता सूची में होता है। सत्ता की मलाई सिर्फ नेताओं और उनके करीबियों तक सीमित रहती है।
जनता की भूमिका एक ‘प्यादे’ से ज़्यादा कुछ नहीं रह गई है – जो हर चाल में कुर्बान हो जाती है ताकि राजा और मंत्री अपनी स्थिति सुरक्षित रख सकें।
नेताओं की
प्रतिबद्धता: अब
व्यक्तिगत हित तक सीमित
आज के अधिकांश नेता उस समय को भूल चुके हैं जब राजनीति का अर्थ “त्याग” था। अब राजनीति में आने का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी लाभ है। वेतन, भत्ते, सुरक्षा, सुविधाएँ – सब कुछ बढ़ाने में नेताओं की एकता दिखती है, पर जनता के मुद्दों पर वही नेता संसद या विधानसभा से गायब मिलते हैं। कभी-कभी तो नेता अपने ही मतदाताओं के क्षेत्र में पाँच साल तक नज़र नहीं आते, पर चुनाव आते ही “जनसेवक” बनकर पहुँच जाते हैं।
मीडिया और
जनता की
भूमिका
मीडिया और जनता भी इस खेल का हिस्सा बन गए हैं। मीडिया का एक बड़ा वर्ग अब जनता की आवाज़ नहीं, बल्कि सत्ता की प्रचार मशीन बन चुका है। जनता भी कभी-कभी जाति, धर्म या छोटे लाभों में उलझकर अपने दीर्घकालिक हित भूल जाती है। राजनीति के शतरंज पर अगर जनता को प्यादा बनने से बचना है, तो उसे सोच-समझकर मतदान करना होगा, न कि भावनाओं में बहकर।
आशा की
किरण: सब
कुछ खत्म नहीं हुआ
फिर भी यह कहना गलत होगा कि सब कुछ खो गया है। आज भी कुछ ऐसे जनप्रतिनिधि हैं जो निष्ठा और ईमानदारी के साथ जनता की सेवा कर रहे हैं। कई युवा नेता और स्वतंत्र जनप्रतिनिधि पारदर्शिता और जवाबदेही की राजनीति लाने का प्रयास कर रहे हैं। सोशल मीडिया और जनचेतना ने भी लोगों को जागरूक किया है। अगर जनता अपनी भूमिका को समझे, सवाल पूछे, जवाब मांगे, तो वही प्यादा एक दिन खेल की दिशा बदलने वाला मोहरा बन सकता है।
निष्कर्ष
“राजनीति के शतरंज पर जनता सिर्फ एक प्यादा” — यह स्थिति चिंता का विषय है। पर इसका समाधान भी जनता के पास ही है। अगर जनता अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को समझे, नेताओं की नीयत पर सवाल उठाए, और हर पाँच साल में सिर्फ वोट न दे बल्कि जवाबदेही भी मांगे, तो राजनीति फिर से अपने मूल स्वरूप – सेवा और समर्पण—की ओर लौट सकती है। राजनीति का खेल तभी सार्थक होगा जब प्यादा भी सम्मानित होगा, और राजा भी जनता के प्रति उत्तरदायी। क्योंकि लोकतंत्र में राजा नहीं, जनता सर्वोच्च होती है — और जब जनता अपनी शक्ति पहचान लेगी, तब शतरंज की बिसात पर प्यादा भी राजा बन जाएगा।
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