जस्टिस सूर्य कांत आज देश की न्यायपालिका के सबसे ऊँचे पद—भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश—पर पहुँच चुके हैं। हरियाणा के हिसार में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सूर्य कांत ने अपनी मेहनत, स्पष्ट सोच और ईमानदार कार्यशैली के दम पर वकालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की यात्रा तय की। 10 फरवरी 1962 को जन्मे कांत ने कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया कि साल 2000 में, मात्र 38 साल की उम्र में, हरियाणा के एडवोकेट जनरल नियुक्त कर दिए गए—जो अपने आप में एक रिकॉर्ड जैसा उपलब्धि है।

इसके बाद 2004 में वे पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के जज बने, 2018 में हिमाचल हाई कोर्ट के जज और 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर उन्होंने काम संभाला। 24 मई 2019 से लेकर आज तक उन्होंने कई बड़े और संवेदनशील मामलों की सुनवाई की है, और अब देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनका कार्यकाल लगभग 15 महीने का होगा। उनका नाम उन जजों में शामिल है जो न सिर्फ कानून को समझते हैं, बल्कि आम आदमी और कमजोर पक्षकारों की बात को भी उतनी ही गंभीरता से सुनते हैं।

 

 

जस्टिस सूर्य कांत ने भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के तौर पर पदभार संभाल लिया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें सुबह 10 बजे राष्ट्रपति भवन में शपथ दिलाई। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व CJI बी.आर. गवई, केंद्रीय मंत्री, लोकसभा स्पीकर और कई देशों से आए जज मौजूद रहे। साथ ही जस्टिस सूर्य कांत के परिवार के सदस्य भी इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने।

हरियाणा से आने वाले पहले CJI

जस्टिस सूर्य कांत का CJI बनना कई वजह से खास है—सबसे बड़ी बात यह कि वे हरियाणा से आने वाले पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया हैं। उनका कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक रहेगा, यानी लगभग 15 महीने तक वे सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष पद पर रहेंगे।

जिस परिवार से वे आते हैं, वह एक मध्यमवर्गीय और सरल परिवेश वाला रहा है। लेकिन उनकी मेहनत और लगातार पढ़ने-समझने की आदत ने उन्हें वहां पहुंचाया जहां बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं। साल 2000 में, जब वे मात्र 38 वर्ष के थे, तब हरियाणा सरकार ने उन्हें एडवोकेट जनरल बनाया। यह पद आमतौर पर बड़े और अनुभवी वकीलों को मिलता है, लेकिन सूर्य कांत की दक्षता और कानूनी पकड़ को देखते हुए यह जिम्मेदारी उनके हाथ में सौंपी गई।

इसके बाद 2004 में वे पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के जज बने, फिर 2018 में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में स्थानांतरित हुए। 2019 में वे सुप्रीम कोर्ट के जज बने और तब से वे कई अहम फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।

 

"वकील का कद मेरे लिए मायने नहीं रखता" - जस्टिस सूर्य कांत:

CJI बनने से पहले ABP न्यूज ने उनसे बातचीत की। एंकर ने सवाल पूछा कि क्या बड़े और कद्दावर वकीलों के कुछ मामलों को सुप्रीम कोर्ट में सुनने की प्रवृत्ति बनी रहती है?
इस पर जस्टिस सूर्य कांत का जवाब बेहद साफ और सादगी भरा था - “मेरे लिए वकील का कद नहीं, केस की फाइल मायने रखती है। अगर मामला हाई कोर्ट का है तो मैं वरिष्ठ वकील को भी वहीं जाने की सलाह दूंगा।” उनका यह बयान बताता है कि वे कोर्ट में किसी भी तरह की पैरवी का प्रभाव नहीं आने देते। निर्णय केवल तथ्य और कानून के आधार पर लेते हैं।

 

लंबित मामलों पर कड़ी चिंता - 90 हजार केस लंबित:

नए CJI ने शपथ से पहले ही साफ कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में 90 हजार से ज्यादा मामले लंबित होना चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि वे जल्द ही बाकी जजों के साथ बैठक करेंगे और लंबित मामलों को तेजी से निपटाने की रणनीति बनाएंगे। खासकर उन मामलों पर ध्यान दिया जाएगा जिनमें संवैधानिक सवाल शामिल हैं। इसके लिए संविधान पीठों का गठन प्राथमिकता में होगा, ताकि अहम मामलों पर जल्द और स्पष्ट फैसला हो सके।

 

मध्यस्थता पर जोर—सरकार को भी दी सलाह:

उन्होंने यह भी कहा कि देश में कई मामले ऐसे हैं जिन्हें कोर्ट में आने की जरूरत ही नहीं होती।
बातचीत, समझौते और मध्यस्थता से बहुत से विवाद हल हो सकते हैं।
उन्होंने साफ कहा— “सरकार सबसे ज्यादा मुकदमे करती है, इसलिए उसे पहले खुद आगे बढ़कर मध्यस्थता अपनानी चाहिए।”

यह बयान बताता है कि वे न्यायपालिका का बोझ कम करने और न्याय को सुलभ बनाने के पक्षधर हैं।

 

कोर्ट में व्यवहार—कठोर नहीं, समझदार जज की छवि:

जस्टिस सूर्य कांत दो दशक से ज्यादा समय से जज हैं। उनकी छवि ऐसे जज की रही है जो कोर्ट में अपनी बात साफ-साफ रखते हैं, लेकिन वकीलों और व्यक्तिगत पक्षकारों को पूरी बात रखने का पूरा मौका देते हैं।

कोर्ट में खुद पेश होने वाले लोगों से वे बेहद मानवीय व्यवहार रखते हैं। कई बार उनकी समस्याओं को परिवार के सदस्य की तरह सुनते और सुझाव भी देते हैं।

 

एक बड़ा फैसला—CJI के अपमान पर नोटिस जारी करने से मना किया:

हाल ही में एक वकील ने तत्कालीन CJI बी.आर. गवई की ओर जूता उछाला था। मामला अवमानना का था। लेकिन जस्टिस सूर्य कांत ने नोटिस जारी करने से साफ मना कर दिया।
उन्होंने कहा - “ऐसे लोगों को महत्व देना ही गलत है। कोर्ट कार्रवाई कर चुका है, हम इसे और बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहते।”

यह फैसला दिखाता है कि वे छोटी बातों से ऊपर उठकर संस्थान का सम्मान बनाए रखने में विश्वास रखते हैं।

 

बड़े और विवादित मामलों की सुनवाई—SIR से लेकर मुस्लिम तलाक तक:

वे इस समय सुप्रीम कोर्ट में कई बड़े मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं—

  • बिहार SIR (मतदाता सूची पुनरीक्षण) मामला
  • शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद
  • अवैध घुसपैठियों का निष्कासन
  • डिजिटल अरेस्ट मुद्दा
  • मुस्लिम तलाक—तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन पर सुनवाई

उन्होंने कहा है कि मुस्लिम तलाक प्रथा में सुधार कर महिलाओं को वही अधिकार दिलाए जाएंगे जो देश की अन्य महिलाओं को मिले हुए हैं।

 

विश्लेषण

जस्टिस सूर्य कांत का CJI बनना केवल पद परिवर्तन नहीं, बल्कि न्यायपालिका में एक नए दृष्टिकोण का आगमन है। उनका पूरा करियर इस बात का संकेत देता है कि वे कानून को सिर्फ किताबों के आधार पर नहीं, बल्कि समाज की वास्तविकता और मानवीय मूल्यों के साथ देखते हैं। उनका मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आना इस बात को और मजबूत करता है कि उन्हें आम आदमी की समस्याओं का वास्तविक चित्र पता है।

लंबित मामलों की भारी संख्या उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन उनकी स्पष्ट सोच से लगता है कि वे केसों को प्राथमिकता और प्रबंधन के आधार पर तेजी से निपटाने की कोशिश करेंगे। मध्यस्थता पर उनका फोकस आने वाले समय में अदालतों का बोझ कम कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात—वे कठोर दंड देने की बजाय सुधार और समाधान वाली सोच रखते हैं, जैसा कि CJI गवई पर जूता फेंकने के मामले में देखा गया।

उनके फैसले और कार्यशैली आने वाले 15 महीनों में न्यायपालिका की दिशा बदलने में अहम साबित हो सकती है।